भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे महानायक हुए हैं, जिन्होंने न केवल देश को विदेशी सत्ता से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया, बल्कि समाज सुधार और राष्ट्रीय पहचान को भी सशक्त किया। ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे— राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
आज उनकी जयंती के अवसर पर, हम राष्ट्र निर्माण में उनके अमूल्य योगदान का स्मरण करते हैं।
एक नज़र में: राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| जन्म तिथि | 1 अगस्त, 1882 |
| जन्म स्थान | प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश |
| उपाधि | राजर्षि (महात्मा गांधी द्वारा प्रदत्त) |
| प्रमुख योगदान | किसान सभा की स्थापना, हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाना |
| सर्वोच्च सम्मान | भारत रत्न (1961) |
| निधन | 1 जुलाई, 1962 |
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
पुरुषोत्तम दास टंडन जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर पूरी की और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून (Law) की डिग्री और इतिहास में मास्टर डिग्री (MA) हासिल की।
एक मेधावी छात्र होने के साथ-साथ, उनके भीतर शुरुआत से ही राष्ट्र प्रेम और समाज सुधार की भावना कूट-कूट कर भरी थी। 1899 में, एक छात्र के रूप में ही उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी, जो उनके लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन की शुरुआत थी।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय योगदान
टंडन जी ने वकालत के पेशे को त्याग कर खुद को पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया।
असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन
उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए असहयोग आंदोलन (1920) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें कई बार जेल की सजा भी काटनी पड़ी।
किसानों के अधिकारों के पैरोकार
उन्होंने किसानों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे किसानों के अधिकारों के कट्टर समर्थक थे और जमींदारी प्रथा के सख्त खिलाफ थे।
कांग्रेस अध्यक्ष
वर्ष 1950 में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया।
हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में भूमिका (Featured Snippet)
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी का सबसे बड़ा और दूरगामी योगदान हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में रहा।
हिंदी के प्रति समर्पण
भारतीय संविधान सभा में बहस के दौरान, टंडन जी ने इस बात की पुरजोर वकालत की कि देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को स्वतंत्र भारत की राजभाषा (Official Language) घोषित किया जाना चाहिए। उनके अथक प्रयासों और तर्कों के परिणामस्वरूप ही संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को यह सम्मान प्राप्त हुआ। इसी कारण उन्हें “हिंदी का प्रहरी” भी कहा जाता है।
राजनीतिक सफर और ‘भारत रत्न’
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, टंडन जी ने उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष (Speaker) के रूप में कार्य किया। वे संविधान सभा के सदस्य रहे और बाद में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के लिए चुने गए।
राजनीति में रहते हुए भी उनका जीवन एक संन्यासी की तरह सादा और उच्च विचारों वाला था। उनके इसी निस्वार्थ और संत जैसे स्वभाव के कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राजर्षि’ (राजा + ऋषि) की उपाधि दी थी।
राष्ट्र के प्रति उनके अमूल्य योगदान, समाज सुधार और हिंदी भाषा की सेवा के लिए, भारत सरकार ने वर्ष 1961 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पुरुषोत्तम दास टंडन जी को ‘राजर्षि’ की उपाधि किसने और क्यों दी थी?
उन्हें ‘राजर्षि’ की उपाधि महात्मा गांधी ने दी थी। राजनीति में रहने के बावजूद उनका जीवन बेहद सादा, सिद्धांतवादी और एक ऋषि के समान था, जिसके कारण उन्हें यह सम्मान दिया गया।
2. हिंदी भाषा के विकास में उनका क्या योगदान था?
उन्होंने संविधान सभा में देवनागरी लिपि वाली हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने के लिए निर्णायक संघर्ष किया। साथ ही, उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन के विस्तार में अहम भूमिका निभाई।
3. उन्हें ‘भारत रत्न’ से कब सम्मानित किया गया?
समाज और राष्ट्र के प्रति उनके असाधारण योगदान के लिए वर्ष 1961 में उन्हें ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया।
सारांश और निष्कर्ष
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सत्ता और राजनीति में रहकर भी सिद्धांतों और सादगी के साथ जिया जा सकता है। उनका स्वतंत्रता संग्राम से लेकर हिंदी को राजभाषा बनाने तक का सफर, आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी जयंती पर पूरा राष्ट्र उनके त्याग और तपस्या को नमन करता है।
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