सिहावा सप्तऋषियों की तपोभूमि (Sihawa : the holy land of Saptarishis)
Sihawa the holy land of Saptarishis: सिहावा (Sihawa), छत्तीसगढ़ राज्य के धमतरी जिले में स्थित एक प्राचीन पर्वत श्रृंखला है, जिसे ‘सप्तऋषियों की तपोभूमि’ (Tapobhumi of the Saptarishis) के रूप में प्रचलित है। यह स्थान न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व भी रखता है।
सिहावा का भौगोलिक परिचय
सिहावा पर्वत श्रृंखला धमतरी जिले के नगरी विकासखंड में स्थित है। यहां से महानदी (Mahanandi) का उद्गम होता है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ की गंगा’ भी कहा जाता है। महानदी का स्रोत एक कमंडल से हुआ माना जाता है, जो पर्वत के शीर्ष से प्रवाहित होकर नीचे धरातल पर गणेश घाट (Ganesh Ghat) से निकलती है।
सप्तऋषियों की तपोभूमि
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सिहावा सप्तऋषियों की तपोभूमि रही है। यहां महर्षि श्रृंगी, अंगिरा, वशिष्ठ, कण्व, अत्रि, विश्वामित्र और अगस्त्य ऋषि ने तपस्या इस पवित्र स्थल थी। इन ऋषियों के आश्रमों के अवशेष आज भी सिहावा पर्वत पर स्थित हैं, जो इस स्थान की धार्मिक महत्ता को दर्शाते हैं।
महर्षि श्रृंगी ऋषि का आश्रम
सिहावा पर्वत की महेंद्रगिरि पहाड़ियों पर महर्षि श्रृंगी ऋषि का आश्रम स्थित है। श्रृंगी ऋषि का उल्लेख रामायण में मिलता है, जहां उन्होंने राजा दशरथ के यज्ञ में आहुति देकर भगवान राम के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया था। उनका आश्रम तांत्रिक पूजा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
महर्षि अंगिरा ऋषि का आश्रम
सिहावा पर्वत में महर्षि अंगिरा ऋषि का आश्रम भी स्थित है, जो ग्राम पंचायत रतावा के पास है। अंगिरा ऋषि को सप्तर्षियों में सबसे वरिष्ठ माना जाता है। उनकी तपस्या की महिमा का वर्णन पौराणिक कथाओं में मिलता है। आज पर्वत शिखर पर स्थित एक छोटी सी गुफा में अंगिरा ऋषि की मूर्ति विराजमान है, जहां भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं।
धार्मिक महत्व और पर्यटन
सिहावा पर्वत धार्मिक पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां शीतला मंदिर, गणेश मंदिर और कर्णेश्वर मंदिर जैसे धार्मिक स्थल स्थित हैं। महानदी और पैरी नदी के संगम पर स्थित कर्णेश्वर मंदिर में प्रतिवर्ष माघ माह में मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
पुरातात्विक महत्व
सिहावा के खंडहरों से छह मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें से पांच मंदिरों का निर्माण चंद्रवंशी राजा कर्ण ने 1114 शक संवत (1192 ईस्वी) में कराया था। ये अवशेष इस क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाते हैं।
महानदी की सभ्यता
महानदी के किनारे बसी सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन मानी जाती है। धमतरी जिले के अरौद गांव में महानदी के किनारे महापाषाण काल के श्मशान घाट और बंदरगाहनुमा चट्टानों के अवशेष मिले हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता के प्रमाण हैं।
सिहावा का सांस्कृतिक महत्व
सिहावा न केवल धार्मिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह क्षेत्र सांस्कृतिक धरोहरों से भी समृद्ध है। यहां के पर्व-त्योहार, मेले और स्थानीय परंपराएं इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करती हैं।
निष्कर्ष
सिहावा, सप्तऋषियों की तपोभूमि, छत्तीसगढ़ की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्थान न केवल आध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है, बल्कि प्राचीन सभ्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं का भी साक्षी है। आज भी सिहावा अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर के कारण पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।