छत्तीसगढ़ की नई नक्सल विरोधी नीति, योजनाएं, अभियान और केंद्र सरकार का सहयोग: एक समग्र विश्लेषण

छत्तीसगढ़ की नई नक्सल विरोधी नीति

Chhattisgarh anti-Naxal policy: छत्तीसगढ़ राज्य दशकों से वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) की चुनौती का केंद्र रहा है। नक्सलवाद या माओवादी विद्रोह यहां के बस्तर क्षेत्र की दुर्गम पहाड़ियों और वन क्षेत्रों में गहरे पैठ जमा चुका था। राज्य और केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में “समाधान” की साझा रणनीति के तहत सख्त सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ विकास और पुनर्वास पर जोर दिया है  । 2023 के अंत में नई सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने 2025 में एक नई नक्सल-विरोधी नीति लागू की, जिसका उद्देश्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाना और मार्च 2026 तक राज्य को नक्सल-मुक्त बनाना है । इन समेकित प्रयासों के परिणाम दिखने लगे हैं – नक्सली हिंसा की घटनाओं में 47% की कमी और नागरिक व सुरक्षाबलों की मौतों में 64% की गिरावट 2010 की तुलना में 2024 में दर्ज की गई  । इस लेख में छत्तीसगढ़ की नई नीतियों (विशेषकर आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025), विकास योजनाओं (जैसे “नियद नेल्लानार” योजना), प्रमुख सुरक्षा अभियानों (जैसे ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट) तथा केंद्र सरकार के सहयोग का विशद विश्लेषण किया गया है। साथ ही आत्मसमर्पण में आई तेज़ी और 2026 तक नक्सलवाद समाप्त करने के दीर्घकालिक लक्ष्य पर चर्चा की गई है।

आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025 का विवरण

छत्तीसगढ़ सरकार ने 2025 में “नक्सली आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति – 2025” को लागू किया, जो पूर्ववर्ती नीति का स्थान लेती है  । इस नीति का लक्ष्य हिंसा का मार्ग छोड़ने वाले नक्सलियों को सम्मानजनक जीवन की ओर मोड़ना और नक्सली हिंसा के शिकार आम लोगों को अधिक सहायता प्रदान करना है  । मुख्यमंत्री विष्णु देव सई (Vishnu Deo Sai) ने इसे एक “संतुलित दृष्टिकोण, जिसमें कड़ी कार्रवाई के साथ पुनर्वास भी जरूरी है” बताया, ताकि नक्सलवाद उन्मूलन के लिए दंड एवं सुधार में संतुलन रहे । इस नई नीति में निम्न प्रावधान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:  

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव सई, जिनकी सरकार ने 2025 में नई आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति लागू की।

पीड़ित सहायता:

आर्थिक मुआवज़ा वृद्धि: नक्सल विरोधी अभियानों में पुलिस के लिए सूचना देने वाले “गोपनीय सैनिक” (informers) के मारे जाने पर अनुग्रह राशि ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख कर दी गई है । इसी प्रकार स्थायी अपंगता की स्थिति में ₹3 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख तक मुआवज़ा मिलेगा ।

भूमि एवं आर्थिक सहायता: नक्सली हिंसा से मारे गए या अपंग हुए नागरिकों के परिजनों को 1.5 हेक्टेयर तक कृषि भूमि या शहरी क्षेत्र में 4 डिसमिल (≈1742 वर्ग फुट) आवासीय भूमि दी जाएगी। यदि भूमि उपलब्ध न हो तो ग्रामीण क्षेत्रों में ₹4 लाख एवं शहरी क्षेत्रों में ₹8 लाख की आर्थिक मदद मिलेगी । पीड़ित परिवार तीन वर्ष के भीतर खुद भूमि खरीदे तो स्टाम्प शुल्क माफ होगा ।

नौकरी अथवा अनुग्रह राशि: यदि किसी मृतक नागरिक के परिवार को सरकारी नौकरी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो ₹15 लाख (₹10 लाख पत्नी/बच्चों को, ₹5 लाख माता-पिता को) की सहायता राशि दी जाएगी । साथ ही, पीड़ित परिवार के सदस्यों के लिए विशेष रोजगार योजनाएँ शुरू की गई हैं । निजी क्षेत्र में नौकरी पाने वाले पीड़ितों का 5 वर्ष तक 40% वेतन (अधिकतम ₹5 लाख प्रति वर्ष) राज्य सरकार देगी, ताकि उनके पुनर्वास में आर्थिक बाधा न आए ।

शिक्षा एवं छात्रवृत्ति: नक्सली हिंसा पीड़ित परिवारों के बच्चों को निःशुल्क आवासीय शिक्षा का प्रावधान है – राज्य के प्रयत्न एवं एकलव्य मॉडल स्कूलों में प्राथमिकता के साथ प्रवेश दिया जाएगा । यदि वे निजी स्कूलों में पढ़ना चाहें तो शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत आरक्षित सीटों पर प्राथमिकता मिलेगी । उच्च शिक्षा या तकनीकी प्रशिक्षण करने वाले छात्र-छात्राओं को ₹25,000 वार्षिक छात्रवृत्ति देने का भी प्रावधान है ।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास:

त्वरित पुनर्वास एवं भत्ता: आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को 120 दिनों के भीतर पुनर्वास सुनिश्चित करने का लक्ष्य है । पुनर्वास प्रक्रिया के दौरान तथा उसके बाद जीवनयापन के लिए उन्हें तीन वर्षों तक ₹10,000 मासिक भत्ता प्रदान किया जाएगा । इसके अतिरिक्त, ₹50,000 की तत्काल नकद सहायता प्रत्येक आत्मसमर्पित कैडर को मिलेगी । राज्य सरकार ने जिलों में पुनर्वास समितियाँ गठित की हैं, जिनके अध्यक्ष जिलाधिकारी और सचिव पुलिस अधीक्षक होंगे, ताकि सभी मामलों की समयबद्ध निगरानी हो सके ।

आवास एवं भूमि सहायता: आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों को समाज की मुख्यधारा में बसाने हेतु आवासीय भूखंड या ग्रामीण क्षेत्र में कृषि भूमि उपलब्ध कराने का प्रावधान है । विशेषकर जिन नक्सलियों के ऊपर ₹5 लाख या अधिक इनाम घोषित था, उन्हें शहरी क्षेत्र में 4 डिसमिल तक आवासीय भूमि या ग्रामीण क्षेत्र में 1 हेक्टेयर तक कृषि भूमि allot की जाएगी । यदि भूमि देना संभव न हो तो स्थायी संपत्ति खरीदने के लिए ₹2 लाख तक की मदद दी जाएगी । इसके अतिरिक्त, अविवाहित आत्मसमर्पित उग्रवादियों (या जिनके जीवनसाथी नहीं हैं) को पुनर्वास अवधि के भीतर विवाह करने पर ₹1 लाख की सहायता राशि मिलेगी, ताकि वे परिवार के साथ स्थिर जीवन शुरू कर सकें ।

हथियार समर्पण प्रोत्साहन: हिंसा छोड़ने वालों को अपने साथ हथियार-गोलाबारूद सौंपने के लिए आकर्षक प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। उदाहरणस्वरूप, एक लाइट मशीनगन (LMG) समर्पण पर ₹5 लाख, एके-47 रायफल पर ₹4 लाख, INSAS या SLR रायफल पर ₹2 लाख का अतिरिक्त “प्रोत्साहन राशि” मिलेगी  । यह राशि हथियारों के प्रकार के अनुसार तय की गई है, ताकि बड़े हथियारों के साथ आत्मसमर्पण के लिए उग्रवादियों को प्रेरित किया जा सके।

विस्फोटक और गुप्त सामग्री बरामदगी बोनस: आत्मसमर्पण के बाद भी उग्रवादी यदि सुरक्षा बलों को IED (इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) या अन्य छिपाए गए विस्फोटकों की जानकारी देकर बरामद करवाते हैं तो उन्हें अतिरिक्त इनाम मिलेगा। 5 किलोग्राम या अधिक वजन के IED बरामद कराने पर ₹15,000, 10 किलोग्राम या अधिक के IED पर ₹25,000 तक प्रोत्साहन राशि दी जाएगी । इसी तरह बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री, हथियार बनाने के उपकरण या 20 किग्रा से अधिक विस्फोटक वाली किसी बड़ी माओवादी ‘डंप’ (छुपी सामग्री के भंडार) के पता लगाने पर ₹1 लाख का इनाम दिया जाएगा । राज्य सरकार ने संगठन में अलग-अलग रैंक के निचले स्तर के नक्सलियों के लिए इनाम की राशि को भी अपडेट किया है, ताकि वे समर्पण के लिए उत्साहित हों ।

कौशल विकास व पुनर्वास पारदर्शिता: आत्मसमर्पण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुसार कौशल प्रशिक्षण और रोज़गार के अवसर मुहैया कराए जाएंगे, ताकि वह वैध आजीविका कमा सके । प्रारंभिक चरण में सुरक्षित ट्रांज़िट कैंपों या पुनर्वास केंद्रों में उन्हें अस्थायी आवास, काउंसलिंग और प्रशिक्षण दिया जाएगा । पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी हेतु एक डिजिटल पोर्टल विकसित किया जा रहा है जिसमें प्रत्येक लाभार्थी (चाहे surrendered नक्सली हो या नक्सल हिंसा का शिकार आम नागरिक) का एक यूनिक ID बनाया जाएगा । जिला स्तर के अधिकारी इस डैशबोर्ड के जरिए हर केस की प्रगति पर नज़र रखेंगे, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे । मुख्यमंत्री ने इस पहल को “हिंसा छोड़ चुके युवाओं के लिए सम्मानपूर्वक समाज में लौटने का सुनहरा अवसर” बताया है और सभी “भटके हुए नौजवानों” से अपील की है कि वे इस रास्ते को चुनें ।

इस नीति का समग्र प्रभाव दोतरफ़ा होने की उम्मीद है – एक ओर पुलिस व सुरक्षाबलों को कठोर कार्रवाई की छूट है, वहीं आत्मसमर्पण करने वालों को उदार पुनर्वास देकर अन्य उग्रवादियों को हिंसा त्यागने को प्रेरित किया जा रहा है । सरकार स्पष्ट संदेश दे रही है कि “हथियार छोड़ो, गले लगो”: यानी जो हथियार डालेगा, उसे शिक्षा, नौकरी, भूमि, और सम्मानपूर्वक जीवन का पूरा मौका मिलेगा; पर जो हिंसा पर कायम रहेगा उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई जारी रहेगी । नीति में पीड़ितों पर विशेष ध्यान देकर नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों को भी न्याय देने की कोशिश की गई है, ताकि उनका सरकार पर विश्वास बने और वे नक्सली विचारधारा से सहानुभूति न रखें। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ की नई आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025 राज्य की समग्र शांति रणनीति का एक अभिन्न अंग है, जो दंड (सुरक्षा अभियान) और सुधार (पुनर्वास) को साथ लेकर चलने पर बल देती है  ।

विकास के लिए पहल: ‘नियद नेल्लानार’ योजना

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार का संदेश साफ है – सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि विकास से भी दिल जीते जाएंगे। इसी दृष्टिकोण से छत्तीसगढ़ सरकार ने 2024 में “नियद नेल्लानार योजना” (Niyad Nellanar Scheme) प्रारंभ की, जिसका उद्देश्य दूर-दराज़ के आदिवासी इलाकों तक बुनियादी सुविधाएँ पहुंचाना और उन्हें राज्य की सामान्य विकास प्रक्रिया से जोड़ना है  । “नियद नेल्लानार” एक स्थानीय दंडामी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “आपका आदर्श गाँव” – अर्थात ऐसा गाँव जहाँ सभी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों और जो बाकी विकसित इलाकों की तरह प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सके  । यह योजना सीधे तौर पर नक्सल प्रभावित अति-पिछड़े ग्रामीण समुदायों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए केंद्रित है, विशेषकर विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों (PVTGs) को लाभान्वित करने पर  ।

इस पहल के तहत सुरक्षा बलों की नई चौकियों/कैंपों को बहु-उद्देश्यीय विकास केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है  । बस्तर क्षेत्र में हाल के वर्षों में पुलिस व अर्धसैनिक बलों के 14 से अधिक नए कैंप स्थापित किए गए हैं । सरकार ने निर्णय लिया कि इन कैंपों के 5 किमी दायरे में आने वाले सभी गाँवों में शासन की जनकल्याणकारी योजनाएँ सघन रूप से लागू की जाएंगी  । नियद नेल्लानार योजना पहले चरण में 5 ज़िलों – सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और कांकेर – के 8 विकासखंडों में फैले 23 सुरक्षा कैंपों के आसपास स्थित 90 गाँवों को कवर कर रही है  । इन चयनित गाँवों में राज्य सरकार की 32 से अधिक प्रमुख व्यक्तिगत लाभ योजनाओं को “सैचुरेशन मोड” (पूर्ण संतृप्ति) में लागू किया जा रहा है, अर्थात हर पात्र ग्रामीण को हर संभव योजना का लाभ देने का प्रयास  । साथ ही बुनियादी सुविधाओं के 25 बिंदुओं पर फोकस है, जो हर गाँव में उपलब्ध कराए जा रहे हैं  ।

मुख्यमंत्री विष्णु देव सई के शब्दों में, अब ये सुरक्षा कैंप केवल पुलिस शिविर नहीं बल्कि बहुउद्देश्यीय विकास केंद्र बन गए हैं, जहाँ से प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि आसपास के गाँवों में पक्की सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, राशन, गैस कनेक्शन (उज्ज्वला योजना) जैसी कम से कम 25 बुनियादी सुविधाएँ मौजूद हों  । साथ ही 32 विभिन्न सरकारी योजनाओं (प्रधानमंत्री जन-धन, उज्ज्वला, आयुष्मान, मनरेगा, पेंशन आदि) का लाभ हर योग्य व्यक्ति तक पहुंचाया जाए  । राज्य सरकार ने प्रारंभिक तौर पर इस योजना के लिए अतिरिक्त ₹20 करोड़ आवंटित किए हैं, और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र एवं राज्य मिलकर और धनराशि उपलब्ध कराएंगे ।

इस विकासपरक पहल के प्रत्यक्ष लाभ अब ज़मीन पर दिखने लगे हैं। वर्षों से नक्सली प्रभाव के चलते सड़कों-पुलों से कटे रहे बीजापुर, दंतेवाड़ा आदि के गांव अब मुख्य सड़क मार्गों से जुड़ रहे हैं  । कई बस्तियों में पहली बार साफ पेयजल पहुंचा है – जैसे पहले जहां ग्रामीण दूषित झरने का पानी पीने को मजबूर थे, वहीं अब हैंडपंप लगाकर स्वच्छ पानी की आपूर्ति की गई है । उदाहरणस्वरूप, बीजापुर ज़िले के दूरस्थ मुटवेड़ी गाँव (Mutvendi) के लोग आज़ादी के बाद पहली बार अपने गाँव में स्कूल खुलने का उत्सव मना रहे हैं । यह गाँव दशकों तक नक्सलियों का गढ़ रहा था, जहाँ शिक्षक जाने से डरते थे। नियद नेल्लानार योजना के तहत वहाँ सुरक्षा कैंप की स्थापना के बाद स्थानीय समुदाय के सहयोग से बच्चों के लिए अस्थायी स्कूल प्रारंभ हुआ और सरकार ने भवन निर्माण की प्रक्रिया भी तेज की है  । 40 साल के लंबे इंतज़ार के बाद स्कूल की घंटी बजते देख गाँववालों में नए भविष्य की आशा जगी है । गाँव के बच्चों को सरकार की ओर से स्कूल ड्रेस, बस्ते और किताबें वितरित की गई हैं, जिससे उनमें उत्साह है (नीले स्कूल यूनिफॉर्म पहने बच्चों की तस्वीरें मीडिया में आईं)।

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट की सफलता के बाद नारायणपुर में स्थानीय नागरिकों ने जांबाज़ सुरक्षाबलों का तिलक लगाकर स्वागत किया। 21 दिन चले इस अभियान में 27 कुख्यात माओवादियों को मार गिराया गया, जिससे इलाके में खुशियाँ मनाई गई  ।

इसी प्रकार एक अन्य दूरस्थ गाँव चिल्कापल्ली (जिला बीजापुर) में आज़ादी के बाद पहली बार बिजली पहुंची है – यह गाँव जिला मुख्यालय से ~50 किमी अंदर जंगल में है जहां अब तक बिजली के खंभे नहीं थे  । चिल्कापल्ली में ट्रांसफॉर्मर और सौर ऊर्जा लैंप लगाकर उजाला पहुंचाया गया, जो “इंडिपेंडेंस के बाद पहली बार” हुआ परिवर्तन है । ये परिवर्तन प्रतीक हैं कि सरकार सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि “विश्वास का प्रकाश” भी इन अंधेरे कोनों में फैला रही है। सुरक्षा कैंपों के आसपास सिविक एक्शन प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं – चिकित्सा शिविर, खेल प्रतियोगिताएँ, कृषि उपकरण वितरण – जिनसे स्थानीय जनता और सुरक्षाबलों के बीच भरोसा बढ़ा है  । वर्षों पहले विवादास्पद सलवा जुडूम आंदोलन (2005-07) के दौरान जिस तरह गाँव के गाँव खाली हो गए थे और स्कूल बंद हो गए थे, आज उसी बस्तर अंचल में फिर से स्कूलों में बच्चे इकट्ठा हो रहे हैं। “स्कूल फिर चलें” अभियान के तहत ग्रामीण खुद मिलकर पेड़-पत्तों और मिट्टी से अस्थायी स्कूल बना रहे हैं ताकि शिक्षा दोबारा शुरू हो सके । यह एक बड़ा परिवर्तन है – सलवा जुडूम के दौरान मानवाधिकार हनन के आरोप लगे और 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे असंवैधानिक ठहराकर बंद कराया था , लेकिन अब सरकार सबक लेकर विकास एवं शिक्षा को ही दीर्घकालिक समाधान के रूप में आगे बढ़ा रही है।

कुल मिलाकर, नियद नेल्लानार योजना छत्तीसगढ़ में “बंदूक से लेकर बल्लम तक” की रणनीति का हिस्सा है – एक ओर सुरक्षाबलों की बंदूक नक्सलियों पर निशाना साध रही है, तो दूसरी ओर सरकार का विकास रूपी बल्लम (हल) ज़मीन पर हरियाली उगा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस पहल की प्रशंसा करते हुए सुझाव दिया कि इसे और विस्तार देकर कैंपों के 5 किमी दायरे की बजाय 10 किमी दायरे तक सभी सुविधाएँ पहुंचाई जाएं  । उनके मुताबिक, हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र के व्यक्ति को भी देश के अन्य क्षेत्रों के समान विकास के अवसर मिलने चाहिए और यही स्थायी शांति का मार्ग होगा  । केंद्र ने राज्य को आश्वासन दिया है कि विकास योजनाओं के लिए धन की कमी नहीं आने दी जाएगी और इस संबंध में राज्य-केंद्र के बीच मज़बूत समन्वय बना हुआ है  ।

प्रमुख सुरक्षा अभियान और उनकी सफलता

छत्तीसगढ़ सरकार ने एक तरफ विकास का हाथ बढ़ाया है, तो दूसरी तरफ दूसरी मुट्ठी में लाठी भी थाम रखी है। बीते दो वर्षों में सुरक्षा बलों ने कई बड़े अभियानों से नक्सलियों को करारी चोट दी है। राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बल (CRPF, CoBRA कमांडो आदि) के संयुक्त अभियान तेज़ी से नक्सली गढ़ों में प्रवेश कर रहे हैं। इनमें कुछ प्रमुख अभियान निम्न हैं:

ऑपरेशन ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ (2025)

अप्रैल–मई 2025 में छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के सघन जंगलों में “ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट” चलाया गया, जिसने भारत के नक्सल विरोधी अभियान के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज की  । यह अभियान केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) और छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा लगातार 21 दिनों तक संयुक्त रूप से चलाया गया, जो अब तक का सबसे लंबा सतत्‌ एंटी-नक्सल ऑपरेशन माना जा रहा है । कर्रेगुट्टालु पहाड़ी (ज़िला नारायणपुर-बीजापुर सीमा, अबूझमाड़ क्षेत्र) पर स्थित माओवादियों के दुर्गम गढ़ को घेरकर इस ऑपरेशन की शुरुआत 21 अप्रैल 2025 को हुई । अभियान के दौरान विभिन्न मुठभेड़ों में लगभग 50 कुख्यात नक्सली मारे गए या घायल हुए  , जिनमें सबसे बड़ी सफलता CPI (माओवादी) के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ़ “बसवराजु” का मार गिराया जाना था  । बसवराजु भारत में माओवादी आंदोलन का शीर्ष नेता और रणनीतिकार था, और पहली बार सुरक्षाबलों ने तीन दशकों में इतने ऊँचे स्तर के नेता को ढेर किया है  । उसके साथ केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो के कई अन्य सदस्य भी इस ऑपरेशन में निष्क्रिय (न्यूट्रलाइज़) कर दिए गए  । यह भारतीय सुरक्षा बलों की नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई में एक “लैंडमार्क एचीवमेंट” के रूप में देखा जा रहा है  ।

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में राज्य के जिला रिज़र्व गार्ड (DRG) के आदिवासी जवानों ने अग्रणी भूमिका निभाई, जिन्हें सटीक ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी कि इस दुर्गम पहाड़ी इलाके में माओवादियों की केंद्रीय समिति की बैठक चल रही है  । घल्लम कैंप (स्थापना: 2022) को फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बनाकर बहु-एजेंसी टीमों ने शानदार समन्वय दिखाया  । इस समांतर बहु-दस्तावेज़ी (multi-agency) प्रयास में CRPF की विशेष जंगल युद्ध Commando Battalion for Resolute Action (CoBRA) यूनिट, DRG, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने मिलकर काम किया  । अभियान की सफलता ने केंद्रीय और राज्य बलों के बीच बेहतर तालमेल और विश्वसनीय इंटेलिजेंस के महत्व को रेखांकित किया है  । सुरक्षाबलों ने इस दौरान नक्सलियों के 214 से अधिक ठिकानों और बंकरों को ध्वस्त किया तथा भारी मात्रा में हथियार एवं रसद बरामद की  । उदाहरण के लिए: लगभग 450 IED, 818 बम-गोलों के खोल (BGL shells), 899 कोडेक्स वायर बंडल, सैकड़ों हथियार और 12,000 किलोग्राम राशन इस ऑपरेशन में ज़ब्त किए गए  । इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक और रसद जब्ती से माओवादियों की कमर लॉजिस्टिक दृष्टि से टूट गई है।

केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट की सराहना करते हुए कहा कि “आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार नक्सलियों के शीर्ष नेता को मार गिराने में सफलता मिली है”  । शाह ने इसे नक्सलवाद को समाप्त करने की लड़ाई में निर्णायक मोड़ बताया और इस ऑपरेशन को अंजाम देने वाले सभी जवानों के जज़्बे को सलाम किया । वास्तव में, इस कामयाबी के बाद बड़े पैमाने पर कई माओवादी आत्मसमर्पण भी हुए। ऑपरेशन पूरा होने तक छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र को मिलाकर कुल 84 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया तथा 54 को गिरफ्तार किया गया  । शीर्ष नेतृत्व खत्म होने और लगातार दबाव में आने से अब माओवादी संगठन में “टूटन और हताशा” का माहौल बताया जा रहा है, जिसका असर कैडर के मनोबल पर पड़ा है  । विशेषज्ञों के अनुसार महासचिव स्तर के नेता की निष्क्रियता से उनकी कमांड-एंड-कंट्रोल संरचना गम्भीर रूप से बाधित होगी और विभिन्न राज्यों में उनके जो संगठनात्मक चैनल हैं, वे कमजोर पड़ जाएंगे  ।

अन्य प्रमुख अभियान

ऑपरेशन प्रहार (2017 – निरंतर): छत्तीसगढ़ पुलिस और CRPF ने 2017 में मिलकर “ऑपरेशन प्रहार” शुरू किया था, जिसका लक्ष्य नक्सलियों के कोर इलाकों में सीधा प्रहार करना था  । 2024 में इस अभियान को नए सिरे से तेज किया गया। अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांकेर ज़िले के हप्तोला जंगलों में सुरक्षाबलों ने प्रहार अभियान के तहत घातक हमला किया, जिसमें 29 माओवादी मारे जाने का दावा किया गया । इन मारे गए नक्सलियों में कुछ पर लाखों रुपये के इनाम थे । 2024 की शुरुआत से मात्र साढ़े चार महीनों में छत्तीसगढ़ में 79 से अधिक नक्सली विभिन्न मुठभेड़ों में मारे जा चुके थे , जो इस अभियान की आक्रामकता को दर्शाता है। केंद्रीय गृहमंत्री ने इन सफलताओं के लिए सुरक्षाबलों को बधाई देते हुए कहा था कि “बहुत जल्द भारत नक्सलवाद से मुक्त होगा”

हालांकि ऑपरेशन प्रहार की तीव्रता के साथ कुछ चिंताएँ और आलोचनाएँ भी उठी हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस अभियान की आड़ में कई निष्पाप आदिवासी ग्रामीण भी मारे गए या गिरफ्तार हुए हैं  । जुलाई 2024 में एक फ्रंटलाइन रिपोर्ट में दावा किया गया कि नई सरकार के सत्ता में आने (दिसंबर 2023) के बाद प्रहार के तहत मुठभेड़ों, गिरफ़्तारियों और आत्मसमर्पणों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही फर्जी मुठभेड़ और मनमानी गिरफ्तारियों के आरोप भी लगे हैं । विपक्षी नेताओं ने भी ऑपरेशन की योजना और समन्वय पर सवाल उठाए – कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे “खराब रूप से डिज़ाइन और अकुशलता से क्रियान्वित” बताया था । स्पष्ट है कि सघन सैन्य अभियानों के दौरान मानवाधिकारों का ध्यान रखना एक चुनौती है, क्योंकि अतीत में सलवा जुडूम जैसी पहल उलटे प्रभाव डाल चुकी है । राज्य सरकार का कहना है कि हर बड़ी कार्रवाई की न्यायिक जांच और SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) के पालन को सुनिश्चित किया जा रहा है ताकि निर्दोष नागरिक प्रभावित न हों, और विश्वसनीय इंटेलिजेंस के आधार पर ही ऑपरेशन किए जाएं।

अन्य अभियान एवं पहल: माओवादियों के खिलाफ समय-समय पर केंद्र और राज्यों ने अन्य संयुक्त ऑपरेशन भी चलाए हैं। अतीत में ऑपरेशन ग्रीन हंट (2009-11) ने नक्सलियों पर बड़ा दबाव बनाया था । 2022 में पड़ोसी राज्य झारखंड में ऑपरेशन डबल बुल और ऑपरेशन ऑक्टोपस जैसे अभियानों से वहां के बड़े नक्सली ठिकाने ख़त्म किए गए, जिसके परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ में शरण लिए कुछ शीर्ष माओवादी नेता पकड़े गए या मारे गए। छत्तीसगढ़ में ऑपरेशन समझौता-प्रहार और ऑपरेशन Thunder जैसे कोडनेम भी समय-समय पर मीडिया में आए हैं, जिनका मकसद विशेष इनपुट के आधार पर सीमित अवधि के लिए बड़ी कार्रवाई करना था । राज्य सरकार ने विशेष बल इकाइयाँ भी गठित की हैं – जैसे बस्तर के स्थानीय युवाओं को शामिल कर “बस्तर बटालियन” खड़ी की गई है, जिसमें आदिवासी समुदाय के जवान अपने इलाके की भौगोलिक व सांस्कृतिक जानकारी का फायदा उठाकर ऑपरेशन में सहयोग देते हैं । इसके अलावा आंध्रप्रदेश की ग्रेहाउंड्स की तर्ज पर छत्तीसगढ़ अपने DRG (डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड) को अत्याधुनिक ट्रेनिंग देकर स्थानीय उग्रवाद-रोधी बल के रूप में इस्तेमाल कर रहा है ।

इन सुरक्षा पहलों का सीधा असर नक्सल संगठन की क्षमता पर पड़ा है। लगातार एंटी-नक्सल ऑपरेशनों की बदौलत छत्तीसगढ़ के कई पुराने “लाल क्षेत्र” अब सिकुड़कर छोटे-छोटे हिस्सों में सिमट गए हैं। कहीं-कहीं जो “निर्जन मुक्त क्षेत्र” (लिबरेटेड ज़ोन) हुआ करते थे, वहां आज पुलिस कैंप स्थापित हो चुके हैं और राज्य का प्रशासनिक झंडा फिर से लहरा रहा है  । बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुन्दरराज पी. के अनुसार 2019 से अब तक 86 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं (केवल बीजापुर में 22 नए कैंप) और 29 और कैंप जल्द खोले जाने की प्रक्रिया में हैं  । अभी बस्तर संभाग में कुल मिलाकर 260 सुरक्षा कैंप काम कर रहे हैं, जिनमें से हर एक कैंप में आमतौर पर 1 कंपनी (80-100 जवान) तैनात है, और कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में इससे भी अधिक बल रखा गया है  । इन कैंपों की बदौलत सुरक्षा बल अब दूरस्थ इलाकों में स्थायी उपस्थिति बनाए हुए हैं, जिससे रेड कॉरिडोर में सेंध लग चुकी है।

केंद्र सरकार की भूमिका और सहयोग

छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या के समाधान में केंद्र सरकार का सहयोग बहु-आयामी रहा है – सुरक्षा बलों की तैनाती से लेकर वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने तक, हर मोर्चे पर केंद्र ने राज्य के साथ मिलकर काम किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर केंद्र ने “डबल इंजन सरकार” के सिद्धांत को अमल में लाते हुए छत्तीसगढ़ को हरसंभव मदद दी है । स्वयं अमित शाह नियमित अंतराल पर छत्तीसगढ़ का दौरा कर वहाँ की सुरक्षा समीक्षा करते हैं और राज्य के अधिकारियों के साथ योजनाएँ बनाते हैं  ।

केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती: आज बस्तर क्षेत्र में केन्द्रीय बलों के 40,000 से अधिक जवान तैनात हैं, जो राज्य पुलिस के ~20,000 जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ऑपरेशन चला रहे हैं । इन केंद्रीय बलों में CRPF की लगभग 40 बटालियन (प्रत्येक में ~1000 कार्मिक) शामिल हैं, जिनमें छह बटालियन CoBRA कमांडो की हैं (लगभग 6000 कमांडो) । इसके अतिरिक्त BSF, ITBP और SSB जैसी अर्धसैनिक इकाइयों की कुछ यूनिट भी सीमावर्ती इलाकों व महत्वपूर्ण बिंदुओं पर तैनात हैं। सितम्बर 2024 में केंद्र ने एक बड़ा कदम उठाते हुए बस्तर में 4 नई CRPF बटालियन (करीब 4000 सैनिक) तुरंत भेजीं, जिनमें से तीन झारखंड और एक बिहार से पुनर्स्थापित की गई थीं  । इन नई तैनात बलों को “नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम प्रहार” के लिए रणनीतिक क्षेत्रों – बीजापुर व सुकमा ज़िलों – में जगह दी गई । साथ ही, केंद्र ने घोषणा की है कि बस्तर में दूसरा “बस्तरिया बटालियन” गठित किया जाएगा जिसमें स्थानीय आदिवासी युवाओं की भर्ती की जाएगी । एक अतिरिक्त ITBP बटालियन भी विशेष रूप से बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जिलों में लगाई जा रही है । इस संयुक्त बल के आकार का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि बस्तर की करीब 40 लाख की आबादी पर 60 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात हैं – यानी हर 66 नागरिक पर एक सुरक्षाकर्मी का अनुपात  । हालांकि भारी सैन्य मौजूदगी कुछ हलकों में चिंताएँ भी पैदा करती है, सरकार का तर्क है कि जब तक क्षेत्र से नक्सली खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, सुरक्षा का यह घेरा ज़रूरी है ताकि विकास कार्य सुरक्षित रूप से पूरे किए जा सकें  ।


वित्तीय सहयोग एवं योजनाएँ: केंद्र सरकार नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए कई विशेष सहायता योजनाएँ चलाती है, जिनमें छत्तीसगढ़ सबसे अधिक लाभार्थियों में से एक है। सुरक्षा संबंधी व्यय (Security Related Expenditure – SRE) योजना के तहत केंद्र, राज्य को नक्सल-विरोधी अभियानों पर होने वाले खर्च का काफी हिस्सा लौटा देती है। पिछले पाँच साल (2019-2024) में सभी नक्सल प्रभावित राज्यों को कुल ₹1925.83 करोड़ SRE मद में जारी हुए, जिनमें से लगभग 43% (₹829.80 करोड़) अकेले छत्तीसगढ़ को मिले हैं  । इसी तरह विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर योजना (SIS) के तहत पुलिस के बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाने के लिए जारी ₹394.31 करोड़ में से छत्तीसगढ़ को ~21.6% (₹85.42 करोड़) प्राप्त हुए हैं । इन पैसों से विशेषकर किलेबंद पुलिस थानों का निर्माण, उन्नत हथियार एवं उपकरण की खरीदी, और खुफिया नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण पर खर्च किया गया । छत्तीसगढ़ में 147 नए फोर्टिफ़ाइड थाने मंज़ूर हुए हैं, जिनमें से 125 बनकर चालू हो चुके हैं । स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस (SCA) योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों में पूंजीगत कार्य (सड़क, पुल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र आदि) हेतु केंद्र ने बीते पाँच सालों में ₹2384 करोड़ विभिन्न राज्यों को दिए, जिसमें से ₹773.62 करोड़ छत्तीसगढ़ को आवंटित हुए । इन मदों के अलावा केंद्र सरकार अपने स्तर पर भी केन्द्रीय एजेंसियों के माध्यम से हेलिकॉप्टर उपलब्ध कराने, कैंपों में बुनियादी ढाँचा सुधारने आदि पर ~₹654 करोड़ खर्च कर चुकी है (पिछले पाँच वर्षों में) ।

कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ को केंद्र-प्रायोजित योजनाओं से भारी लाभ मिला है जिसका उपयोग राज्य ने सुरक्षा एवं विकास दोनों मोर्चों पर किया है। “समाधान” नामक केन्द्रीय रणनीति (Smart Leadership, Aggressive Strategy, Motivation & Training, Actionable Intelligence, Dashboard Monitoring, Harnessing Technology, Action Plan for each zone, No funding for militants) को राज्यों के साथ मिलकर ज़मीन पर उतारा जा रहा है । छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित “यूनिफाइड कमांड” व्यवस्था भी सक्रिय है, जिसमें राज्य के वरिष्ठ अधिकारी, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कमांडर और खुफिया एजेंसियों के प्रतिनिधि मिलकर रणनीति बनाते हैं । अंतर-राज्यीय समन्वय बढ़ाने के लिए पड़ोसी राज्यों (तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओड़ीशा, झारखंड) के अधिकारियों के साथ नियमित बैठकें की जा रही हैं, ताकि एक राज्य से भागकर दूसरे राज्य में शरण लेने वाले नक्सलियों पर शिकंजा कसा जा सके  । अमित शाह ने खुद निर्देश दिया है कि “नक्सलियों के खिलाफ जारी लड़ाई बिखरने ना पाए” और राज्य पुलिस व केन्द्रीय एजेंसियों में तालमेल की कमी नहीं आने दी जानी चाहिए ।

केंद्र सरकार प्रेरणा एवं प्रोत्साहन की नीति भी अपना रही है। अमित शाह ने हाल में घोषणा की कि “जिस गाँव के सभी सक्रिय नक्सली आत्मसमर्पण करेंगे, उसे आधिकारिक तौर पर ‘नक्सल- मुक्त’ घोषित कर उस पंचायत के विकास के लिए ₹1 करोड़ का विशेष अनुदान दिया जाएगा।” । इस अनोखी घोषणा का उद्देश्य गाँव-स्तर पर लोगों को प्रोत्साहित करना है कि वे नक्सल प्रभावित अपने परिचितों/रिश्तेदारों को हिंसा छोड़ने के लिए तैयार करें, तथा पूरा गाँव शांति बहाली में भागीदार बने। यह प्रावधान राज्य की 2025 की नीति का भी हिस्सा है । इसके अतिरिक्त, केंद्र ने आदिवासी युवाओं को रोज़गार देने के लिए सुरक्षाबलों में विशेष भर्ती अभियान चलाए हैं (बस्तरिया बटालियन इसका एक उदाहरण है)। सेना और अर्धसैनिक बलों में छत्तीसगढ़ के युवा बड़ी संख्या में भर्ती हो रहे हैं, जिससे उन्हें वैकल्पिक रोज़गार के साथ राष्ट्रसेवा का अवसर मिल रहा है।

बढ़ते आत्मसमर्पण: कारण और प्रभाव

वर्ष 2023-25 के दौरान छत्तीसगढ़ में नक्सली कैडरों के आत्मसमर्पण में अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गई है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ वर्ष 2024 में 881 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया , जो किसी भी एक वर्ष में अब तक की सर्वाधिक संख्या है। 2025 में भी अप्रैल तक 521 माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके थे , और पूरे वर्ष यह संख्या 1000 के पार जा सकती है। आत्मसमर्पण करने वालों में कई दर्जनों ऐसे मीडियम रैंक कमांडर भी शामिल हैं जिनके सरेंडर को पहले असंभव माना जाता था, जैसे कुछ DVC (डिविजनल कमेटी) सदस्यों ने भी हथियार डाले हैं। इस चलन के पीछे कई कारण प्रभावी रहे हैं:

उच्च नेतृत्व की मौत/गिरफ्तारी: ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियानों में जब शीर्ष नेता बसवराजु तक मारे गए , तो निचले स्तर के कैडरों में भय व निराशा का माहौल पैदा हुआ। नेता विहीन होती जा रही पार्टी में कई सदस्यों को अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा, जिससे वे आत्मसमर्पण को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। बड़े कैडरों के खात्मे से नक्सली ग्रुप में विश्वास का संकट आया है, जिससे युवाओं में विद्रोह छोड़कर सरेंडर करने की प्रवृत्ति बढ़ी है  ।

आकर्षक पुनर्वास पैकेज: जैसा कि पूर्वोक्त अनुभाग में विस्तार से बताया गया, छत्तीसगढ़ की नई आत्मसमर्पण नीति 2025 में आर्थिक व सामाजिक पुनर्वास के उदार प्रावधान हैं – नकद राशि, वजीफ़ा, भूमि, रोज़गार, घर, शादी अनुदान से लेकर सुरक्षा  । इन ऑफर्स ने कई मोहभंग हो चुके नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए आकर्षित किया है। उदाहरण के लिए, दंतेवाड़ा में एक पूर्व जनमिलिशिया कमांडर ने आत्मसमर्पण के बाद कहा कि “पुरानी जिंदगी में सिर्फ डर था, नई जिंदगी में बच्चों के लिए स्कूल, बीवी के लिए घर और मेरे लिए रोज़गार है” – यह बदलाव नीति के असर को दर्शाता है।

परिवारों को भरोसे में लेना: पुलिस ने आत्मसमर्पण बढ़ाने के लिए एक सॉफ्ट रणनीति भी अपनाई है, जिसमें माओवादियों के परिवारों व गाँव के सरपंचों/बुजुर्गों के माध्यम से उन्हें समझाइश भिजवाई जाती है कि वे हिंसा त्याग दें। कई मामलों में माता-पिता या पत्नी की अपील पर कैडर ने समर्पण किया है। जब सरकार ने यह भरोसा दिलाया कि आत्मसमर्पण करने वालों को कानूनी कार्रवाई में राहत और पुनर्वास में सहायता मिलेगी, तो परिवार भी आगे आकर अपील करने लगे। इस सामाजिक दबाव ने भी हिंसा छोड़ने को प्रेरित किया है।

संगठन की आंतरिक कलह: लगातार मिल रही शिकस्त और विचारधारा से मोहभंग के कारण CPI (माओवादी) के अंदर भी मतभेद उभर रहे हैं। कुछ शीर्ष नेताओं (जैसे ओड़ीशा कैडर बनाम तेलंगाना कैडर) में संसाधनों के बंटवारे को लेकर असंतोष की खबरें हैं। ऐसे में नीचले कैडर अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संगठन से निकलकर सरकार की शरण में आने लगे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले कई युवाओं ने स्वीकार किया कि जंगल में जीवन बेहद कठिन और आदर्शहीन हो चला था, जबकि बाहर सरकार उन्हें मौक़ा दे रही है।

सरकार इन आत्मसमर्पणों को अपनी “हार्ड + सॉफ्ट” नीति की सफलता के तौर पर पेश करती है। स्वयं केन्द्रीय गृह मंत्री ने आंकड़े देते हुए बताया कि “2019 के बाद से देशभर में 2,000 से अधिक नक्सलियों ने हथियार डाले हैं”, जिनमें छत्तीसगढ़ सबसे आगे है । शाह ने यह भी कहा कि “पहले नक्सली युवाओं को गुमराह करते थे, अब वही युवा विकास की राह चुन रहे हैं – यह अपने आप में बड़ी कामयाबी है”। उधर, माओवादी नेताओं ने इन आत्मसमर्पणों को कमतर आंकने की कोशिश की है। हाल ही में माओवादियों द्वारा जारी एक पत्र में कहा गया कि “सिर्फ आत्मसमर्पण बढ़ने से समस्या हल नहीं होती, असली मुद्दे जस के तस हैं” – उनका इशारा आदिवासियों की ज़मीन, संसाधन और अधिकारों की ओर था। बहरहाल, बढ़ते आत्मसमर्पणों ने माओवादियों की जनधारणा युद्ध (propaganda war) को झटका दिया है। जब मीडिया में रोज़ ये खबर आती है कि फलाँ क्षेत्र के इतने नक्सली आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे, तो आम ग्रामीणों में भी नक्सल आंदोलन के प्रति भरोसा कम होता जाता है।

सरकार की कोशिश है कि आत्मसमर्पण करने वालों का पुनर्वास सफल हो, ताकि वे दोबारा बंदूक न उठाएँ। इसके लिए जिला प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि प्रत्येक आत्मसमर्पित व्यक्ति/महिला से नियमित संपर्क रखा जाए, उनकी आजीविका, कौशल प्रशिक्षण इत्यादि को मॉनिटर किया जाए । डिजिटल ट्रैकिंग पोर्टल इसकी निगरानी में मदद कर रहा है । अब तक पुनर्वास कार्यक्रमों से गुज़रे सैंकड़ों पूर्व नक्सली या तो सरकारी नौकरी (जैसे सहायक आरक्षक या होमगार्ड) कर रहे हैं या कृषि/व्यवसाय में लग गए हैं। कुछ ने मिलकर किसान उत्पादक संगठन (FPO) भी बनाए हैं और गांवों में खेती-बाड़ी को बढ़ावा दे रहे हैं – ये नक्सलवाद से शांति की ओर परिवर्तन के जीते-जागते उदाहरण हैं।

2026 तक नक्सल-मुक्त छत्तीसगढ़: दीर्घकालिक लक्ष्य और चुनौतियाँ

छत्तीसगढ़ ने औपचारिक रूप से मार्च 2026 तक राज्य को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य घोषित किया है । यह लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की देश को 2025-26 तक नक्सल-मुक्त देखने की संकल्पना का हिस्सा है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह विभिन्न मंचों से दोहरा रहे हैं । नवंबर 2024 में बस्तर के एक दौरे पर शाह ने सुरक्षाबलों को “नक्सलवाद पर निर्मम आखिरी प्रहार” करने को कहा और विश्वास जताया कि “मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में नक्सलवाद इतिहास बन जाएगा” । छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री (2024 में पदस्थ) विष्णु देव सई भी इसे अपनी सरकार का मुख्य मिशन बता चुके हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री ने मई 2025 में एक बड़ी मुठभेड़ के बाद बयान दिया कि “हमारे सुरक्षा बल दिन-रात मेहनत कर रहे हैं ताकि 2026 की समयसीमा से पहले ही बस्तर को नक्सल- मुक्त घोषित किया जा सके”

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहु-स्तरीय रणनीति पर काम चल रहा है:

शेष बचे गढ़ों पर तीव्र कार्रवाई: वर्तमान में नक्सलियों की गतिविधि दक्षिण बस्तर (सुकमा-बीजापुर के कुछ अंदरूनी इलाकों) और उड़ीसा सीमा से लगे गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) व कोरापुट (ओड़ीशा) से सटे क्षेत्रों तक सिमट गई है। इन्हीं स्थानों पर शीर्ष नेता छुपे होने की सूचना है। 2025-26 में इन इलाकों में और अधिक फ़ोर्स भेजकर “सर्च एंड डिस्ट्रॉय” ऑपरेशन चलाने की योजना है। ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी जैसी तकनीक से भी मदद ली जा रही है  । विशेष बलों के स्मार्ट इंटेलिजेंस-आधारित ऑपरेशन सुनिश्चित करने पर जोर है, जिससे आम नागरिकों की जान को ख़तरा न्यूनतम रहे और सटीक प्रहार हो  ।

विकास लक्ष्यों की निरंतरता: सरकार 2026 तक बस्तर के प्रत्येक गांव को सड़क द्वारा ब्लॉक मुख्यालय से जोड़ना चाहती है। रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट फॉर LWE एरिया (2016) के तहत सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है । 2025 के अंत तक बस्तर में 1000 किलोमीटर नई सड़कों के निर्माण का लक्ष्य है, जिसमें से अधिकतर पूरी हो चुकी हैं। साथ ही हर गांव तक बिजली, हैंडपंप/नल-जल, मोबाइल कनेक्टिविटी लाने का कार्य प्रगति पर है। जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकार सुनिश्चित करने के लिए वन अधिकार पट्टों का वितरण तेज़ किया गया है , ताकि ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई हो सके और आदिवासी महसूस करें कि सरकार उनकी हितैषी है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत बस्तर संभाग के जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण के मानकों को ऊपर उठाने पर काम जारी है ।

नए नेतृत्व का उदय रोकना: बसवराजु की मृत्यु के बाद माओवादियों ने आपातकालीन तौर पर नया महासचिव चुना है, लेकिन उसके पास अनुभव और करिश्मा की कमी है। सुरक्षाबलों की रणनीति यह भी है कि 2026 से पहले शेष सेन्ट्रल कमेटी के सदस्यों को पकड़ लिया जाए या निष्क्रिय कर दिया जाए, ताकि संगठन सिर विहीन हो जाए। ख़ुफ़िया एजेंसी (IB) और राज्य के SIB लगातार शीर्ष नेताओं की मूवमेंट पर नजर रखे हुए हैं। किसी भी नए भर्ती होने वाले कैडर को शुरुआती स्तर पर ही आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जा रहा है (कई बार अभिभावकों को समझा कर युवाओं को जंगल छोड़ने पर मजबूर किया गया है)। इस प्रकार कैडर सप्लाई लाइन को तोड़ने पर भी फोकस है।

स्थायी शांति हेतु न्याय एवं सुलह: सरकार जानती है कि सिर्फ बल प्रयोग से समस्या का जड़ से हल नहीं होगा; इसलिए आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन के अधिकार सुरक्षित रखने और उनके साथ हुए अत्याचारों पर सुलह व पुनर्वास भी दीर्घकालिक शांति के लिए ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2011 में Salwa Judum को गलत ठहराए जाने के बाद राज्य ने अर्धसैनिक बलों पर अधिक निर्भरता बढ़ाई थी, लेकिन अब फिर से लोकल कम्युनिटी पुलिसिंग को मजबूत किया जा रहा है। सिविक एक्शन प्रोग्राम के ज़रिए पुलिस-जनता मैत्री बढ़ाकर अविश्वास दूर किया जा रहा है । सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि सुरक्षा अभियानों में यदि कोई ज्यादती या गलती होती है तो उसके लिए जवाबदेही तय होगी। हाल के वर्षों में कुछ मामलों में पुलिसकर्मियों पर मानवाधिकार उल्लंघन के मुकदमे भी दर्ज हुए हैं, जो राज्य की जिम्मेदारी दर्शाते हैं। दीर्घकालिक दृष्टि यह है कि “न्याय के बिना शांति नहीं” (No peace without justice) के सिद्धांत पर चलकर ही टिकाऊ समाधान निकलेगा  ।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ में चल रही नई नक्सल-विरोधी नीति और अभियान एक समग्र एवं संतुलित रणनीति का प्रतिफल हैं, जिसमें बंदूक और कलम दोनों का समान महत्व है। एक ओर अभूतपूर्व सुरक्षा अभियानों ने नक्सल संगठन की रीढ़ तोड़ी है – शीर्ष नेताओं का खात्मा, हथियारों-गोला बारूद की जब्ती और लगातार दबिश ने माओवादियों को छुपने पर मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर विकास योजनाओं और पुनर्वास नीतियों ने स्थानीय जनता का मन जीतना शुरू किया है – ग्रामीण सड़क, बिजली, पानी, स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएँ पाकर सरकार को अपना मददगार मानने लगे हैं। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति 2025 ने हिंसा का चक्रव्यूह तोड़ने के लिए एक सुरक्षित द्वार खोल दिया है, जिससे सैकड़ों युवा बाहर निकलकर सामान्य जीवन जीने को तैयार हुए हैं । केंद्र और राज्य के अभिन्न सहयोग ने संसाधनों की कोई कमी नहीं रहने दी – भरपूर फंडिंग, आधुनिक हथियार, उन्नत प्रशिक्षण, और संयुक्त कमांड के माध्यम से समन्वित प्रयास ने साबित किया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो परिणाम हासिल किए जा सकते हैं ।

निःसंदेह चुनौतियाँ अभी बाकी हैं। बस्तर के दुर्गम जंगलों में छुपे कट्टरपंथी गुट आखिरी संघर्ष के लिए कुख्यात हो सकते हैं – सुरक्षा बलों को अत्यंत सतर्कता और विवेक के साथ ऑपरेशन जारी रखने होंगे, ताकि निर्दोष आदिवासी हानि से बचें। विकास कार्यों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर तक उतारने में अफसरशाही की सुस्ती या भ्रष्टाचार आड़े नहीं आना चाहिए। साथ ही, जो क्षेत्र अभी “मुक्त” हो गए हैं, वहां शासन का दृढ़ एवं संवेदनशील Präsenz बनाए रखना जरूरी है – पुलिस कैंप के साथ-साथ स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, बैंक, बाज़ार को भी टिकाऊ रूप से चलाना होगा ताकि खाली जगह में फिर से विद्रोह का बीज न पनपे।

फिर भी, वर्तमान रुझानों को देखें तो आशा की जा सकती है कि छत्तीसगढ़ 2026 तक अपने नक्सल-मुक्ति के लक्ष्य के काफी निकट पहुंच जाएगा“लाल आतंक” (Red Terror) के कब्ज़े से छूटकर जो “हरित शांति” (Green Peace) का सूर्योदय बस्तर की पहाड़ियों पर हो रहा है, उसे कायम रखना वहां के लोगों की भी जिम्मेदारी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि राज्य जिन उद्देश्यों की लड़ाई लड़ रहा है – समाज के हाशिए पर रहे आदिवासियों को न्याय और विकास देना – वे उद्देश्यों से कभी समझौता नहीं होना चाहिए, क्योंकि अंततः न्यायपूर्ण विकास ही स्थायी शांति की गारंटी है। छत्तीसगढ़ ने बंदूक और कलम दोनों से लड़ाई जीतने की जो पहल की है, वह देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है, बशर्ते इसे संवेदनशीलता, सतर्कता और सतत प्रयास से जारी रखा जाए।


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