छत्तीसगढ़ किसान वृक्ष मित्र योजना : Kishan Vriksha Mitra Yojana 2025

Kishan Vriksha Mitra Yojana 2025

Kishan Vriksha Mitra Yojana 2025: छत्तीसगढ़ राज्य में निजी भूमि पर वृक्षों की कटाई एवं बिक्री अब तक एक असंगठित क्षेत्र रहा है, जिसके कारण किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है । वर्तमान में बस्तर, बिलासपुर तथा सरगुजा आदि क्षेत्रों में कुछ किसान यूकेलिप्टस जैसे पेड़ लगा रहे हैं, जिनकी कटाई पर तेलंगाना व मध्यप्रदेश स्थित कागज़ मिलें उन्हें ख़रीदती हैं, किंतु बायबैक (वापस खरीद) की कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं है । ऐसी परिस्थिति में किसानों को वृक्षारोपण से दीर्घकालिक आर्थिक लाभ सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है। किसानों की आय बढ़ाने और राज्य में वन आवरण एवं लकड़ी आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2023 में किसान वृक्ष मित्र योजना की शुरुआत की है। यह योजना राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा संचालित एक नवाचारी पहल है, जिसका उद्देश्य निजी भूमियों पर वाणिज्यिक एवं आर्थिक रूप से लाभकारी वृक्ष प्रजातियों का संगठित रोपण कराना तथा उपज के लिए सुनिश्चित बाज़ार उपलब्ध कराना है।

योजना के उद्देश्य

किसान वृक्ष मित्र योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों और अन्य भूस्वामियों को अपनी निजी भूमि पर आर्थिक रूप से लाभकारी वृक्ष प्रजातियों का रोपण करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस योजना द्वारा उत्पादित लकड़ी की बायबैक हेतु भागीदार संस्थानों/कंपनियों के माध्यम से पूर्व-व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी, जिससे किसानों को अपने उत्पाद का निश्चित खरीदार मिले और उनकी आय में वृद्धि हो । साथ ही, यह योजना राज्य में काठ एवं प्लाइवुड जैसे लकड़ी आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर राज्य के राजस्व में वृद्धि करने का लक्ष्य रखती है । इसके अतिरिक्त, वृक्षारोपण गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन होगा और सहभागी निवेश (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के माध्यम से वृक्षारोपण पर आने वाले शासकीय व्यय में कमी लाने में मदद मिलेगी । संक्षेप में, इस योजना के माध्यम से:
• किसानों एवं अन्य निजी भूमि धारकों की भूमि पर व्यावसायिक पेड़ लगाकर उनकी आय में वृद्धि करना ।
• भागीदार कंपनियों द्वारा उपज की खरीद (बायबैक) सुनिश्चित कर किसानों को विपणन का आश्वासन देना ।
• राज्य में लकड़ी व फर्नीचर उद्योगों को कच्चा माल देकर उद्योगों को बढ़ावा देना ।
• सरकार के कर आधार को बढ़ाकर राजस्व में वृद्धि करना ।
• ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार का सृजन करना तथा साझेदारी से वित्तीय बोझ बांटकर सरकारी व्यय में कमी लाना ।

प्रमुख विशेषताएँ

किसान वृक्ष मित्र योजना की रुपरेखा को विभिन्न श्रेणियों के लाभार्थियों की जरूरतों के अनुसार छह मॉडलों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक मॉडल में लाभार्थियों को भूमि की उपलब्धता, क्षेत्रफल और भागीदारी के स्तर के आधार पर वित्तीय सहायता का प्रावधान है। मॉडल 1 के अंतर्गत छोटे किसानों (जिनके पास 5 एकड़ तक भूमि है) द्वारा अधिकतम 5,000 वृक्षों का रोपण करने पर राज्य सरकार की ओर से 100% वित्तीय अनुदान प्रदान किया जाता है (यानी पूरा खर्च सरकार उठाएगी)। मॉडल 2 के अंतर्गत वे किसान अथवा सरकारी/अर्ध-सरकारी/स्वायत्त संस्थान आते हैं जिनके पास 5 एकड़ या उससे अधिक भूमि है – ऐसे मामलों में प्रति एकड़ अधिकतम 1000 पौधों के रोपण पर सरकार द्वारा 50% वित्तीय सहायता तीन वर्षों तक उपलब्ध कराई जाती है, शेष 50% व्यय लाभार्थी द्वारा वहन किया जाएगा । मॉडल 3 में निजी शैक्षणिक संस्थान, निजी ट्रस्ट, गैर-सरकारी संगठन (NGOs), पंचायतें तथा लीज़ पर भूमि धारणकर्ता (लीज़धारी) शामिल हैं; ये यदि अपनी भूमि पर वृक्षारोपण करना चाहें तो तीन वर्षों के लिए 50% अनुदान वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा प्रदान किया जाएगा, तथा शेष खर्च उन्हें स्वयं उठाना होगा । इस मॉडल में भूमि के आकार या रोपित वृक्षों की संख्या की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं है ।

मॉडल 4 उन किसानों या संस्थानों के लिए है जो अपने उपलब्ध 5 एकड़ भूमि (अधिकतम 5000 वृक्ष) पर वृक्षारोपण करना चाहते हैं और किसी सहायक संस्था/निजी कंपनी की भागीदारी से वित्तीय सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। इस स्थिति में भी राज्य सरकार द्वारा 50% अनुदान तीन वर्षों हेतु दिया जाएगा , तथा शेष खर्च लाभार्थी या भागीदार संस्था मिलकर उठाएँगे। मॉडल 5 के तहत संभवतः ऐसा प्रावधान है जिसमें बड़े भूमि धारकों के समूह या किसी संगठन के माध्यम से वृक्षारोपण पर वित्तीय सहभागिता को प्रोत्साहित किया गया है (इस संबंध में उपलब्ध दस्तावेज़ में सीमित जानकारी है)। अंततः मॉडल 6 पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का उन्नत स्वरूप है, जिसमें यदि कोई निजी शिक्षण संस्था, ट्रस्ट, NGO, पंचायत या लीज़धारी अपनी भूमि पर ऐसी प्रजातियों का वृक्षारोपण करना चाहते हैं जिनके उत्पाद की खरीद हेतु कोई बाहरी संस्था/निजी कंपनी अग्रिम इच्छुक है, तो वित्तीय भार 50:50 के अनुपात में सरकार व भागीदार के बीच बांटा जाता है। इस मॉडल में कुल व्यय का 25% अनुदान वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग देगा और 25% संबंधित भागीदार संस्था/कंपनी द्वारा दिया जाएगा, शेष 50% खर्च लाभार्थी को स्वयं वहन करना होगा। इसके अतिरिक्त भागीदार संस्था किसानों से उत्पाद की बायबैक (खरीद) सुनिश्चित करेगी, जिससे किसानों को बाज़ार की गारंटी मिले। यदि किसी संस्था द्वारा वन संरक्षण कानून के तहत अनिवार्य वृक्षारोपण कराया जा रहा है, तो उस परिस्थिति में किसान वृक्ष मित्र योजना का लाभ उन पौधारोपण कार्यों पर नहीं लिया जा सकेगा। योजना के सभी मॉडलों में वृक्षारोपण क्षेत्र में घेराबंदी (फ़ेंसिंग) और सिंचाई की व्यवस्था लाभार्थी द्वारा अपने स्तर पर करनी आवश्यक है ।

योजना के तहत प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ चिन्हित की गई हैं जिन्हें तेज़ी से बढ़ने वाली और आर्थिक लाभ देने वाली माना जाता है। इन प्रजातियों में क्लोनल यूकेलिप्टस (नीलगिरी), ऊतक-संवर्धित सागवान (टीक), ऊतक-संवर्धित बाँस, तथा मेलिया डूबिया (मालाबार नीम) प्रमुख हैं । इन पौधों को ऊतक संवर्धन (टिशू कल्चर) तकनीक के माध्यम से उगाया जाता है ताकि बेहतर वृद्धि दर व गुणात्मक लकड़ी प्राप्त हो सके। उपरोक्त मुख्य प्रजातियों के अतिरिक्त अन्य आर्थिक दृष्टि से लाभकारी प्रजातियाँ (जैसे कत्था, शीशम आदि) को भी सीमित पैमाने पर शामिल किया गया है। प्रति एकड़ लगभग 1000 पौधे रोपे जाने का मानक रखा गया है, जिससे भूमि का अधिकतम उपयोग हो सके । योजना की अवधि को वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2029-30 तक निर्धारित किया गया है, अर्थात यह एक दीर्घावधि (लगभग 7 वर्ष) परियोजना है। पहले वर्ष (2023-24) में 36,000 एकड़ क्षेत्र में वृक्षारोपण करने का लक्ष्य रखा गया है, तथा अगले दो वर्षों तक उस रोपण के रखरखाव (जंगली घास नियंत्रण, खाद-पानी आदि) हेतु वित्तीय सहायता जारी रहेगी । आगामी वर्षों में भी नए वृक्षारोपण लक्ष्यों के साथ यह चक्र चलता रहेगा। योजना का कुल अनुमानित बजट लगभग ₹140 करोड़ निर्धारित किया गया है, जिसमें प्रथम वर्ष वृक्षारोपण संबंधी उच्च लागत तथा द्वितीय व तृतीय वर्ष के रखरखाव हेतु क्रमशः घटती निधि का प्रावधान शामिल है। हर अगले वर्ष मज़दूरी दर में औसतन 7.5% वृद्धि को बजट अनुमान में शामिल किया गया है, जिससे महंगाई व वेतन वृद्धि का समायोजन हो सके।

कार्यान्वयन तंत्र

इस योजना का क्रियान्वयन छत्तीसगढ़ सरकार के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा किया जा रहा है । विभाग स्तर पर नीति निर्धारण एवं मार्गदर्शन के बाद ज़मीनी स्तर पर वन विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय (जैसे वन परिक्षेत्राधिकारी एवं वन मंडलाधिकारी) इसके कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी हैं। लाभार्थी किसानों/संस्थाओं का चयन विभाग के फील्ड स्टाफ द्वारा किया जाएगा, जो विभिन्न चल रही योजनाओं में कार्यरत प्रबंधन दलों के माध्यम से इच्छुक लाभार्थियों से संपर्क करेंगे । जिस भी किसान या संस्था की सहमति वृक्षारोपण हेतु होगी, उसे इस योजना के लाभार्थी के रूप में नामांकित किया जाएगा । लाभार्थियों को योजना के अंतर्गत पंजीकरण या आवेदन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है, जिसमें भूमि के स्वामित्व/पट्टे संबंधी विवरण, रोपण क्षेत्रफल, प्रस्तावित प्रजातियाँ आदि जानकारी देनी होगी। तत्पश्चात संबंधित मॉडल के अनुसार समझौता ज्ञापन (MoU) या अनुबंध किया जाएगा जिसमें वन विभाग, लाभार्थी तथा (यदि हो) भागीदार कंपनी/संस्था के मध्य दायित्वों एवं अधिकारों को परिभाषित किया जाएगा।

वन विभाग तकनीकी मार्गदर्शन एवं निगरानी की भूमिका निभाएगा। उन्नत किस्म के पौधों (जैसे टिशू कल्चर सागवान, यूकेलिप्टस क्लोन) की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग अपने नर्सरी नेटवर्क या मान्यता प्राप्त निजी नर्सरियों/कंपनियों के साथ समन्वय करेगा। रोपण कार्य का संपूर्ण क्रियान्वयन लाभार्थी द्वारा ही किया जाएगा; विभाग के अधिकारियों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण कर सत्यापन किया जाएगा कि पौधारोपण ठीक प्रकार से हुआ है और देखभाल की जा रही है । कार्य की पुष्टि होने पर अनुदान की राशि लाभार्थी के खाते में अथवा निर्धारित प्रक्रिया अनुसार जारी की जाएगी । आमतौर पर वित्तीय अनुदान किस्तों में प्रदान किया जाता है – संभवतः पहली किस्त रोपण पूर्ण होने के बाद, तथा शेष किस्तें रखरखाव कार्य के संतोषजनक निष्पादन के आधार पर प्रति वर्ष। विभाग यह भी सुनिश्चित करेगा कि भागीदार कंपनियाँ अपने अनुबंध अनुसार किसानों से उत्पाद की खरीद करें। योजना में उत्पाद बिक्री (हार्वेस्टिंग) का समय प्रजाति के अनुसार अलग-अलग होगा (जैसे यूकेलिप्टस एवं बांस 5-7 वर्ष में कटाई योग्य हो सकते हैं, जबकि सागवान को 15 वर्ष या अधिक भी लग सकते हैं)। अतः योजना के दीर्घकालिक संचालन के लिए प्रारंभिक वर्षों में लगाई गई फसलों की कटाई के समय पर कंपनियों के साथ बायबैक व्यवस्था प्रभावी रखना आवश्यक होगा। विभाग इस बायबैक प्रक्रिया की निगरानी करेगा, ताकि किसान उत्पाद बेचकर आय प्राप्त कर सकें और यदि कहीं बाधा आए तो समाधान हो। साथ ही, यदि बाज़ार मूल्य सरकार द्वारा सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम हो तो भागीदार कंपनियों को समर्थन मूल्य प्रदान करने हेतु बाध्य किया जा सकता है (अनुबंध शर्तों के अनुसार), जिससे किसानों के हित सुरक्षित रहें।

वित्तीय प्रावधान

योजना के वित्तीय प्रावधान लाभार्थी श्रेणी व मॉडल के आधार पर भिन्न हैं। लघु व सीमांत किसानों (5 एकड़ से कम भूमि वाले) को प्रोत्साहित करने के लिए शत-प्रतिशत अनुदान का प्रावधान किया गया है, अर्थात वृक्षारोपण एवं तीन वर्षों तक रखरखाव का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। बड़े किसानों अथवा संस्थानों (5 एकड़ या अधिक) हेतु अनुदान की दर 50% रखी गई है , अर्थात लगात का आधा हिस्सा सरकार देगी तथा शेष आधा लाभार्थी को स्वयं लगाना होगा। यह अनुदान तीन वर्षों तक चरणबद्ध रूप में दिया जाएगा – प्रथम वर्ष वृक्षारोपण के समय मुख्यतः गड्ढा खुदाई, पौध खरीद, रोपण, खाद, संरक्षण आदि पर खर्च होता है; दूसरे व तीसरे वर्ष केवल देखरेख (सिंचाई, खाद, निराई-गुड़ाई) पर अपेक्षाकृत कम खर्च आता है। योजना में प्रति पौधा लागत एवं रखरखाव खर्च के मानक तय किए गए हैं, जिनके आधार पर प्रति एकड़ या प्रति हेक्टेयर सहायता राशि का अनुमान होता है। उदाहरणार्थ, क्लोनल यूकेलिप्टस के प्रति हेक्टेयर (लगभग 2.5 एकड़) 2500 पौधों के लिए प्रथम वर्ष खर्च ₹4200 प्रति एकड़ (या समतुल्य) आंका गया है, जबकि दूसरे वर्ष ₹1505 व तीसरे वर्ष ₹1618 प्रति एकड़ – कुल मिलाकर लगभग ₹7323 प्रति एकड़ तीन वर्षों में । इसी प्रकार सागवान, बांस, मेलिया डूबिया आदि के लिए भी व्यय मानक निर्धारित हैं, जिनमें प्रथम वर्ष सबसे अधिक तथा बाद के वर्षों में क्रमशः कम खर्च अनुमानित है। अनुदान राशि इन मानकों के अनुसार अधिकतम सीमा तक दी जाएगी। यदि वास्तविक खर्च इन निर्धारित रकम से कम आता है तो अनुदान वास्तविक खर्च के अनुपात में ही होगा।

जिस मॉडल में किसी निजी कंपनी या उद्योग की साझेदारी शामिल है (मॉडल 6), उसमें कुल खर्च का 25% कंपनी द्वारा निवेश किया जाएगा और 25% सरकार देगी – इस तरह लाभार्थी पर 50% खर्च का भार आएगा। निजी भागीदार द्वारा निवेश आमतौर पर कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) या कच्चे माल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने की दृष्टि से किया जाता है। सरकार द्वारा दिए जाने वाले अनुदान के स्रोत में राज्य बजट के अलावा संभावित रूप से CAMPA (क्षतिपूरक वनीकरण कोष) या हरित निधियों का उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि यह योजना वनों के विस्तार व जलवायु परिवर्तन शमन से संबद्ध है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में इस योजना हेतु प्रावधानित राशि से 36,000 एकड़ में वृक्षारोपण एवं पूर्ववर्ती वर्ष के पौधों के रखरखाव का खर्च सम्मिलित है । अगले दो वर्षों (2024-25 और 2025-26) में पूर्व रोपण के रखरखाव के लिए धनराशि की आवश्यकता होगी, जो कि क्रमशः कम होगी। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ष नए वृक्षारोपण जुड़ते जाने से 2029-30 तक वार्षिक बजट आवश्यकताओं का एक क्रम होगा, जिसका अनुमान सरकारी दस्तावेज़ों में प्रस्तुत किया गया है। कुल मिलाकर 2023-2030 की अवधि में इस योजना के तहत लगभग ₹140 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। यदि महंगाई या मज़दूरी दर बढ़ती है तो बजट अनुमानों में आवश्यक संशोधन भी किए जाएंगे (दस्तावेज़ में 7.5% वार्षिक वृद्धि मानकर अनुमान जोड़े गए हैं)। वित्तीय प्रावधानों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लाभार्थी समय पर व गुणवत्तापूर्ण वृक्षारोपण करें और अनुदान की किस्तों के उपयोग में पारदर्शिता रखी जाए।

लक्षित लाभार्थी समूह

इस योजना का लाभ मुख्यतः छोटे एवं बड़े किसान उठा सकते हैं, जो अपनी निजी ज़मीन पर पेड़ लगाकर अतिरिक्त आय अर्जित करना चाहते हैं। साथ ही शैक्षणिक संस्थान, निजी ट्रस्ट, गैर-सरकारी संगठन (NGO), ग्राम पंचायतें तथा लीज़ पर भूमि धारक (पट्टाधारी) भी इस योजना के तहत वृक्षारोपण के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्राप्त कर सकते हैं । यदि किसी सरकारी, अर्ध-सरकारी या स्वायत्त संस्था के पास खाली भूमि है और वह वृक्षारोपण करना चाहती है, तो वह भी योजना के दायरे में शामिल है । इस प्रकार योजना के लक्षित लाभार्थी व्यापक हैं, जिनमें व्यक्तिगत किसान से लेकर संस्थागत भूस्वामी तक सभी शामिल हैं। विशेष रूप से, ऐसे किसान जिनके पास खेती के साथ-साथ अनुपयोगी या परती ज़मीन है, वे आर्थिक लाभ के लिए वृक्षारोपण को एक दीर्घकालिक निवेश के रूप में अपना सकते हैं। लघु एवं सीमांत किसानों को 100% अनुदान की सुविधा देकर उन्हें वृक्षारोपण गतिविधि से जोड़ने का प्रयत्न किया गया है, ताकि भूमि-धारिता की कमी उनके लिए बाधा न बने। उधर बड़े किसान या संस्थान, जिनके पास पूँजी व ज़मीन दोनों हैं, उन्हें 50% अनुदान के माध्यम से प्रोत्साहन दिया गया है कि वे वाणिज्यिक प्रजातियों के बागान स्थापित करें।

योजना उन औद्योगिक इकाइयों या कंपनियों को भी परोक्ष रूप से लाभान्वित करती है जो कच्चे माल के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, कागज़ मिल, प्लाइवुड निर्माता, फर्नीचर उद्योग आदि भागीदार कंपनियों के रूप में किसानों के साथ अनुबंध करके भविष्य में सुनिश्चित आपूर्ति प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार उपभोक्ता उद्योग भी इस योजना के सहभागी लाभार्थी हैं, हालांकि प्रत्यक्ष अनुदान उन्हें नहीं बल्कि किसानों को मिलता है। कुल मिलाकर, किसान वृक्ष मित्र योजना निजी और सार्वजनिक – सभी प्रकार के भूस्वामियों के लिए खुली है, बशर्ते वे निर्धारित नियमों का पालन करते हुए चयनित प्रजातियों का वृक्षारोपण करने के इच्छुक हों।

पर्यावरणीय प्रभाव

पर्यावरण की दृष्टि से किसान वृक्ष मित्र योजना को एक महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है, क्योंकि यह राज्य के कुल हरित आवरण में वृद्धि करेगी। निजी भूमि पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण होने से वृक्ष आच्छादन (Tree Cover) बढ़ेगा, जो कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक होगा। वृक्ष कार्बन डाईऑक्साइड का अवशोषण करके कार्बन सिक्वेस्ट्रेशन करते हैं, अतः बड़ी संख्या में वृक्ष लगाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन संतुलित करने में मदद मिलेगी। योजना के अंतर्गत चयनित प्रजातियाँ जैसे यूकेलिप्टस, सागवान, बांस और मालाबार नीम तेज़ी से बढ़ने वाली हैं तथा इनमें कार्बन जज़्ब (carbon sequestration) करने की क्षमता अच्छी होती है। विशेषकर बांस और यूकेलिप्टस कुछ ही वर्षों में परिपक्व हो जाते हैं, जिससे कम समय में अधिक कार्बन स्थिरीकरण संभव है।

इस वृक्षारोपण से क्षेत्रीय जैव-विविधता पर भी प्रभाव पड़ेगा। जहां एक ओर विशाल monoculture (एकल-प्रजाति) बागान पारिस्थितिकी पर कुछ हद तक प्रतिकूल असर डाल सकते हैं, वहीं यदि मिश्रित प्रजातियों का प्रयोग किया जाए तो पक्षियों, कीड़ों आदि के लिए आवास बढ़ेगा। खेतों की मेड़ों एवं सीमांत भूमि पर पेड़ लगने से मृदा संरक्षण को बल मिलेगा – जड़ों के फैलाव से मिट्टी कटाव रुकेगा और मिट्टी की नमी बनी रहेगी। वृक्षों की मौजूदगी से क्षेत्र का सूक्ष्म जलवायु (micro-climate) अनुकूल होगा, तापमान में अतिशय उतार-चढ़ाव कम होंगे तथा नमी बढ़ेगी। छायादार वृक्ष खेतों में खड़े रहने से भूमि के तापमान को नियंत्रित रखते हैं और आस-पास की फसलों को लू अथवा तेज़ धूप से कुछ हद तक बचाव मिलता है। इसके अतिरिक्त, वृक्ष वर्षा जल को धरती में रिसने का समय देते हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण में सहायता मिलती है। कुल मिलाकर, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से पर्यावरणीय संतुलन को सुधारा जा सकता है और स्थानीय स्तर पर हरितिमा बढ़ेगी, जिसे ‘हरित छत्तीसगढ़’ की परिकल्पना की दिशा में एक कदम कहा जा सकता है।

सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव

किसान वृक्ष मित्र योजना के दूरगामी सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव अपेक्षित हैं। सबसे प्रमुख प्रभाव किसानों की आय में वृद्धि के रूप में होगा। पारंपरिक फसलों के मुकाबले वृक्षारोपण एक मध्यम से दीर्घकालिक निवेश है, जो कटाई के समय एकमुश्त बड़ा आर्थिक प्रतिफल दे सकता है। उदाहरणार्थ, 5-7 वर्षों में यूकेलिप्टस का पेड़ परिपक्व होकर बिकने योग्य होता है; यदि किसान ने सहकारी कंपनी के साथ मूल्य पूर्व-निर्धारित कर रखा है तो कटाई पर अच्छा धनराशि मिल सकती है। इस प्रकार की एग्रो-फोरेस्ट्री से किसानों के आय स्रोत विविध होंगे और केवल अनाज फ़सलों पर निर्भरता कम होगी। लंबी अवधि में यह ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में भी मददगार हो सकता है, क्योंकि वृक्ष एक तरह से किसान की “हरित पूँजी” बन जाते हैं जिसे आवश्यकता पड़ने पर काटकर आय प्राप्त की जा सकती है।

योजना का एक अन्य सामाजिक लाभ रोज़गार सृजन के रूप में है । वृक्षारोपण के विभिन्न चरणों में – गड्ढा खोदना, पौधे लगाना, पानी देना, रखरखाव, कटाई – स्थानीय मज़दूरों एवं कृषि श्रमिकों को काम मिलेगा। खासकर मानसून के दौरान वृक्षारोपण अभियान चलाने से ग्राम स्तर पर अस्थायी रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। बाद के वर्षों में लकड़ी की कटाई, परिवहन और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) में भी श्रमिकों की आवश्यकता होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसा प्रवाह बढ़ेगा। यदि स्थानीय युवाओं को पौधों की देखभाल या नर्सरी प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाता है तो कौशल विकास के साथ स्थायी आजीविका के रास्ते खुल सकते हैं।

इस योजना से कृषि एवं उद्योग के बीच साझेदारी को भी प्रोत्साहन मिलेगा। किसान और लकड़ी-उद्योग आपस में जुड़े हुए हितधारक बनेंगे। उद्योगों को कच्चा माल स्थिर आपूर्ति में मिलेगा तो वे अपने उत्पादन का विस्तार करेंगे, जिससे आर्थिक विकास होगा और राज्य को कर/राजस्व मिलेगा। किसानों को उद्योगों से जोड़ने के सरकार के लक्ष्य – जैसे कॉपरेटिव फ़ॉर्मिंग या कॉन्ट्रैक्ट फ़ॉर्मिंग – को यह योजना practically साकार करती है, क्योंकि यहां अनुबंधित वृक्षारोपण होता है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक सहभागिता भी बढ़ेगी; किसान समूह बनाकर या सहकारी संस्थाओं के माध्यम से बड़ी जोत पर सामूहिक वृक्षारोपण कर सकते हैं, जिससे छोटे किसानों को भी बड़े पैमाने के लाभ मिल सकें।

सामाजिक दृष्टि से, वृक्षारोपण संस्कृति को बढ़ावा मिलने से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। गाँवों में यदि पेड़ों को आर्थिक महत्व के साथ जोड़ा जाएगा, तो पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगेगी और लोग वृक्ष मित्र बनकर संरक्षक की भूमिका निभाएंगे। इससे सामूहिक रूप से पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव विकसित होगा। आगे चलकर यही किसान जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने में राज्य के सहायक बनेंगे, क्योंकि हरित आवरण बढ़ाना जलवायु अनुकूलन (climate adaptation) का हिस्सा है। कुल मिलाकर, किसान वृक्ष मित्र योजना छत्तीसगढ़ में हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) की नींव मजबूत करने, किसानों को सशक्त बनाने और सतत विकास लक्ष्यों की पूर्ति में योगदान देने वाली एक क्रांतिकारी पहल के रूप में उभरती है।

महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) उत्तर सहित

प्रश्न 1: किसान वृक्ष मित्र योजना शुरू करने की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
(क) राज्य में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई रोकने के लिए।
(ख) निजी भूमि पर वृक्षों की कटाई/बिक्री असंगठित होने व किसानों को उचित मूल्य न मिलने के कारण।
(ग) वृक्षारोपण के पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा देने के लिए।
(घ) किसानों को केवल पारंपरिक फसलें उगाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए।

उत्तर: (ख)। स्पष्टीकरण: छत्तीसगढ़ में निजी भूमि पर वृक्षों की कटाई एवं बिक्री एक बिखरा हुआ (असंगठित) क्षेत्र है, जिससे किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पा रहा था । इसी समस्या के समाधान एवं किसानों को वृक्षारोपण के माध्यम से लाभ दिलाने हेतु इस योजना की शुरुआत की गई।

प्रश्न 2: किसान वृक्ष मित्र योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(क) किसानों को उनकी फसलों के लिए बीमा कवर प्रदान करना।
(ख) किसानों की निजी भूमि पर आर्थिक रूप से लाभकारी वृक्ष लगाकर उनकी आय बढ़ाना तथा उपज की खरीद (बायबैक) सुनिश्चित करना।
(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में सभी खाली भूमि का अधिग्रहण करना।
(घ) केवल सरकारी भूमि पर वनीकरण करके जंगल का क्षेत्रफल बढ़ाना।

उत्तर: (ख)। स्पष्टीकरण: योजना के मुख्य लक्ष्यों में किसानों की निजी भूमि पर व्यावसायिक महत्व के पेड़ लगाना, भागीदार कंपनियों द्वारा उनके उत्पाद की खरीद सुनिश्चित करना और इस प्रकार किसानों की आय में वृद्धि करना शामिल है । साथ ही इससे उद्योगों को कच्चा माल व राज्य को राजस्व भी मिलता है, परंतु बीमा कवच या भूमि अधिग्रहण जैसे विकल्प इस योजना के उद्देश्य नहीं हैं।

प्रश्न 3: किसान वृक्ष मित्र योजना का क्रियान्वयन कौन सा विभाग कर रहा है?

(क) कृषि विभाग

(ख) वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग

(ग) ग्रामीण विकास विभाग

(घ) राजस्व विभाग

उत्तर: (ख)। स्पष्टीकरण: यह योजना छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की पहल है । कृषि विभाग या अन्य विभाग इसमें सहायक भूमिका में हो सकते हैं, किंतु नोडल विभाग वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ही है क्योंकि यह वनीकरण और हरित पहल से संबन्धित योजना है।

प्रश्न 4: योजना के तहत छोटे किसानों (5 एकड़ से कम भूमि) के लिए अनुदान संबंधी क्या प्रावधान है?

(क) कोई अनुदान नहीं मिलेगा।

(ख) 50% लागत का अनुदान 3 वर्ष तक मिलेगा।

(ग) 100% लागत का अनुदान 3 वर्ष तक मिलेगा।

(घ) केवल प्रथम वर्ष ही अनुदान मिलेगा, बाद में नहीं।

उत्तर: (ग)। स्पष्टीकरण: योजना में छोटे लाभार्थियों को पूर्ण प्रोत्साहन देने के लिए 100% वित्तीय अनुदान का प्रावधान रखा गया है, अर्थात 5 एकड़ तक भूमि वाले किसानों के वृक्षारोपण एवं तीन वर्ष तक रखरखाव का सारा खर्च सरकार उठाएगी। यह प्रावधान उन्हें बिना आर्थिक बोझ के वृक्षारोपण से जुड़ने हेतु है।

प्रश्न 5: 5 एकड़ या अधिक भूमि वाले लाभार्थियों (बड़े किसान/संस्थान) को सरकार द्वारा कितने प्रतिशत अनुदान तीन वर्षों तक दिया जाएगा?

(क) 25%

(ख) 50%

(ग) 75%

(घ) 100%

उत्तर: (ख)। स्पष्टीकरण: बड़े किसानों या संस्थानों के मामले में योजना में 50% अनुदान निर्धारित है । शेष 50% खर्च लाभार्थी को स्वयं करना होगा। यह अनुदान तीन वर्ष (रोपण वर्ष + दो रखरखाव वर्ष) तक चरणबद्ध रूप से दिया जाता है।

प्रश्न 6: किसान वृक्ष मित्र योजना के अंतर्गत कुल कितने मॉडल (श्रेणियाँ) बनाए गए हैं?

(क) 2 मॉडल – छोटे किसान और बड़े किसान

(ख) 4 मॉडल

(ग) 6 मॉडल

(घ) 10 मॉडल (प्रत्येक जिले हेतु अलग)

उत्तर: (ग)। स्पष्टीकरण: योजना को विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार 6 मॉडलों में बांटा गया है। इन मॉडलों में लाभार्थियों की प्रकृति (किसान, संस्था, भागीदार वाली/बिना भागीदार वाली आदि) के अनुसार भिन्न-भिन्न अनुदान व साझेदारी प्रावधान रखे गए हैं, जैसा कि विश्लेषण में विवरण दिया गया है।

प्रश्न 7: निम्न में से किस प्रजाति का वृक्ष किसान वृक्ष मित्र योजना के तहत प्रोत्साहित नहीं किया गया है?

(क) क्लोनल यूकेलिप्टस (नीलगिरी)

(ख) ऊतक-संवर्धित सागवान

(ग) आम (मैंगो)

(घ) मेलिया डूबिया (मालाबार नीम)

उत्तर: (ग) आम। स्पष्टीकरण: इस योजना में मुख्यतः तेज़ी से बढ़ने वाले और औद्योगिक उपयोग के वृक्ष लगाए जा रहे हैं – जैसे यूकेलिप्टस, सागवान, बांस, मेलिया डूबिया आदि । आम जैसे फलदार पेड़ या अन्य पारंपरिक फलों के बगीचे इस योजना के दायरे में नहीं हैं, क्योंकि योजना का फोकस फल उत्पादन पर नहीं बल्कि लकड़ी एवं औद्योगिक कच्चे माल पर है।

प्रश्न 8: मेलिया डूबिया (Malabar Neem) को शामिल करने का कारण क्या हो सकता है?

(क) यह बहुत धीमी वृद्धि वाला मूल्यहीन वृक्ष है।

(ख) यह तेज़ी से बढ़ने वाली प्रजाति है जिसकी लकड़ी का वाणिज्यिक मूल्य है।

(ग) इसकी लकड़ी केवल जलाऊ लकड़ी के काम आती है, और कोई उपयोग नहीं।

(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।

उत्तर: (ख)। स्पष्टीकरण: मेलिया डूबिया को मालाबार नीम या कड़ी नीम भी कहते हैं। यह तेज़ी से बढ़ने वाला वृक्ष है, जिसकी लकड़ी प्लाइवुड उद्योग में खूब इस्तेमाल होती है और कम समय में पैदावार देता है। इसी आर्थिक महत्व के कारण इसे योजना में शामिल किया गया है, न कि केवल जलाऊ लकड़ी हेतु।

प्रश्न 9: योजना में वित्तीय अनुदान लाभार्थी को कितने वर्षों तक प्रदान किया जाएगा?

(क) केवल पहले वर्ष

(ख) पहले दो वर्ष

(ग) तीन वर्ष तक

(घ) लगातार दस वर्षों तक

उत्तर: (ग) तीन वर्ष तक। स्पष्टीकरण: किसान वृक्ष मित्र योजना के तहत सरकार वृक्षारोपण संबंधी वित्तीय सहायता तीन वर्षों तक देती है  – पहले वर्ष रोपण के समय, तथा उसके बाद दो वर्षों तक रखरखाव के लिए। यह अवधि पौधे के शुरुआती विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है। तीन वर्ष बाद वृक्ष पर्याप्त बड़े हो जाते हैं और अक्सर विशेष देखभाल की जरूरत कम हो जाती है।

प्रश्न 10: मॉडल 6 (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल) में व्यय वहन का कौन सा अनुपात सही है?

(क) 50% सरकार : 50% किसान (कोई निजी भागीदारी नहीं)

(ख) 50% सरकार : 25% किसान : 25% निजी कंपनी

(ग) 25% सरकार : 25% निजी कंपनी : 50% किसान

(घ) 25% सरकार : 75% निजी कंपनी (किसान खर्च शून्य)

उत्तर: (ग) 25% सरकार : 25% निजी कंपनी : 50% किसान। स्पष्टीकरण: मॉडल 6 में कुल खर्च का 50% साझा तौर पर सरकार व निजी भागीदार द्वारा वहन किया जाता है (25%+25%) तथा शेष 50% किसान द्वारा। इस मॉडल में भागीदार कंपनी वित्तीय सहयोग के साथ-साथ उत्पाद की खरीद (बायबैक) की गारंटी भी देती है। विकल्प (ख) गलत है क्योंकि उसमें किसान का योगदान 25% ही दिखाया गया, जबकि वास्तव में किसान का हिस्सा 50% है।

प्रश्न 11: योजना के तहत प्रति एकड़ लगभग कितने पौधे लगाने का लक्ष्य/मानक है?

(क) 100 पौधे

(ख) 400 पौधे

(ग) 1000 पौधे

(घ) 5000 पौधे

उत्तर: (ग) 1000 पौधे प्रति एकड़। स्पष्टीकरण: दस्तावेज़ के अनुसार लाभार्थी प्रति एकड़ अधिकतम 1000 वृक्ष लगा सकते हैं । 5 एकड़ भूमि पर अधिकतम 5000 पौधे का उल्लेख है, जिससे प्रति एकड़ 1000 का मानक निकलता है। घनत्व ऊंचा रखने से कम भूमि से अधिक उत्पादन लिया जा सकेगा।

प्रश्न 12: किसान वृक्ष मित्र योजना किस अवधि (वर्ष) के लिए लागू की गई है?

(क) 2020-2025

(ख) 2021-2024

(ग) 2023-2030

(घ) 2025-2035

उत्तर: (ग) 2023-2030। स्पष्टीकरण: योजना को वित्तीय वर्ष 2023-24 से प्रारंभ करके 2029-30 तक चलाने का खाका तैयार किया गया है। यानी कुल लगभग 7 साल की अवधि हेतु इसे क्रियान्वित किया जाएगा। विकल्प (क), (ख) पुरानी या छोटी अवधि हैं, जबकि (घ) अनुमानित अवधि से बाहर है।

प्रश्न 13: निम्न कथनों पर विचार करें:

 1. किसान वृक्ष मित्र योजना में केवल किसान ही लाभार्थी हो सकते हैं, कोई अन्य संस्थान नहीं।

 2. इस योजना में भागीदार कंपनियों के माध्यम से उत्पाद की खरीद की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।

 3. योजना का एक उद्देश्य लकड़ी आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना भी है।

सही कथन का चयन कीजिए:

(क) केवल 1 और 2

(ख) केवल 2 और 3

(ग) केवल 1 और 3

(घ) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (ख) केवल कथन 2 और 3 सही हैं। स्पष्टीकरण: कथन 1 गलत है क्योंकि किसान के अतिरिक्त शिक्षण संस्थान, पंचायत, NGO आदि भी लाभार्थियों में शामिल हैं । कथन 2 सही है – भागीदार कंपनियों द्वारा बायबैक सुनिश्चित करना योजना की मुख्य विशेषता है । कथन 3 भी सही है – लकड़ी आधारित उद्योगों को कच्चा माल एवं प्रोत्साहन देना योजना के उद्देश्यों में शामिल है ।

प्रश्न 14: योजना के तहत किसानों को होने वाले प्रमुख लाभों में शामिल नहीं है:

(क) दीर्घकालिक आय का स्रोत

(ख) खेत की मिट्टी की उर्वरता में कमी

(ग) सामूहिक खेती व साझेदारी के अवसर

(घ) कृषि जोखिम में कमी व आय का विविधीकरण

उत्तर: (ख) खेत की मिट्टी की उर्वरता में कमी। स्पष्टीकरण: वृक्षारोपण सामान्यतः मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने या संरक्षण में मदद करता है, न कि घटाता है। अन्य विकल्प योजना के लाभों से संबंधित हैं: वृक्ष एक लंबी अवधि का निवेश होकर आय का अतिरिक्त स्रोत बनते हैं, समूह में पेड़ लगाने से किसानों को आपस में सहयोग के अवसर मिलते हैं, तथा फसल चक्र में पेड़ शामिल होने से कृषि जोखिम (केवल एक फसल पर निर्भरता) घटती है और आय के स्रोत विविध होते हैं – ये सभी वास्तविक लाभ हैं। मिट्टी की उर्वरता घटने की बात योजना का उद्देश्य या लाभ नहीं है।

प्रश्न 15: किसान वृक्ष मित्र योजना से पर्यावरण को होने वाले लाभ के संदर्भ में गलत कथन चुनें:

(क) वृक्षारोपण से कार्बन अवशोषण बढ़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन शमन में सहायक है।

(ख) पेड़ों की जड़ें मिट्टी को स्थिर कर भू-क्षरण रोकने में मदद करती हैं।

(ग) वृक्षारोपण से स्थानीय जैव-विविधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

(घ) बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से हरित आवरण में वृद्धि होगी।

उत्तर: (ग) गलत है। स्पष्टीकरण: वृक्षारोपण से स्थानीय जैव-विविधता प्रभावित होती है – सकारात्मक रूप से भी (यदि मिश्रित प्रजातियाँ हों तो पक्षी-पशु आवास बढ़ते हैं) और नकारात्मक रूप से भी (एकल प्रजाति बड़े क्षेत्र में लगाने से कुछ जैविक विविधता घट सकती है)। विकल्प (क), (ख), (घ) सभी वृक्षारोपण के सकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को दर्शाते हैं: कार्बन सिक्वेस्ट्रेशन में वृद्धि, मिट्टी का संरक्षण, तथा हरित आवरण का विस्तार, जो सही हैं।

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