मल्हार का इतिहास : सातवाहन, शरभपुरीय, कलचुरी और कला-स्थापत्य | CGPSC

मल्हार के इतिहास, सातवाहन कालीन नगर-विकास, शरभपुरीय काल, कलचुरी शासन, पातालेश्वर मंदिर, मूर्तिकला और प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों को CGPSC के लिए सरल भाषा में जानें।

मल्हार का इतिहास: सातवाहन से कलचुरी काल तक कला और स्थापत्य की पूरी जानकारी

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में मल्हार का विशेष महत्व है। यह केवल एक पुरातात्त्विक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन नगर-विकास, धार्मिक परंपराओं, मूर्तिकला और मंदिर स्थापत्य के विकास को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है।

मल्हार से प्राप्त पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर यहां प्राचीन काल से मध्यकाल तक के जीवन की झलक मिलती है। सातवाहन काल में यहां नियोजित नगर-निर्माण के प्रमाणों का उल्लेख मिलता है, जबकि बाद के कालों में यह धार्मिक एवं कला गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

CGPSC की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए मल्हार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जुड़े प्रश्न छत्तीसगढ़ इतिहास, पुरातत्व, कला-संस्कृति और राजवंशों से पूछे जा सकते हैं।

CGPSC Exam Focus: मल्हार को याद रखने का सबसे आसान तरीका है—प्राचीन मार्ग → सातवाहन नगर-विकास → शरभपुरीय कला-केंद्र → कलचुरी स्थापत्य → पातालेश्वर मंदिर → मूर्तिकला।

मल्हार कहां स्थित है?

प्रदत्त स्रोत के अनुसार मल्हार बिलासपुर से शिवरीनारायण की ओर जाने वाले मार्ग से संबंधित क्षेत्र में स्थित है। इसका ऐतिहासिक महत्व इसकी भौगोलिक स्थिति से भी जुड़ा रहा है।

प्राचीन समय में यह क्षेत्र उत्तर भारत और दक्षिण-पूर्वी भारत के बीच संपर्क स्थापित करने वाले मार्ग से जुड़ा हुआ था। इसी कारण मल्हार में व्यापार, आवागमन और सांस्कृतिक गतिविधियों के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनीं।

मल्हार का प्राचीन मार्गीय महत्व

मल्हार का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका प्राचीन मार्ग पर स्थित होना है।

प्रदत्त सामग्री के अनुसार कौशांबी से दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट की ओर जाने वाला प्राचीन मार्ग निम्न स्थानों से होकर गुजरता था:

कौशांबी → भरहुत → बांधवगढ़ → अमरकंटक → खुरुद → मल्हार → सिरपुर → जगन्नाथपुरी

इस मार्ग से मल्हार के प्राचीन व्यापारिक एवं सांस्कृतिक महत्व को समझने में सहायता मिलती है।

परीक्षा में याद रखने योग्य

कौशांबी से जगन्नाथपुरी की दिशा में जाने वाले प्राचीन मार्ग में मल्हार एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

मल्हार में पुरातात्त्विक प्रमाण

मल्हार के उत्खनन से विभिन्न ऐतिहासिक कालों से जुड़े प्रमाण प्राप्त होने का उल्लेख है।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • मुद्राएं
  • अभिलेख
  • ईंटों से निर्मित संरचनाएं
  • मृद्भांड
  • मंदिरों के अवशेष
  • धार्मिक मूर्तियां
  • नगर-निर्माण से संबंधित प्रमाण

इन पुरातात्त्विक अवशेषों से मल्हार के क्रमिक विकास तथा यहां विकसित धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को समझने में सहायता मिलती है।


सातवाहन काल में मल्हार

मल्हार के इतिहास में सातवाहन काल महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

प्रदत्त स्रोत में मल्हार के उत्खनन से सातवाहन शासकों की मुद्राएं प्राप्त होने का उल्लेख है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मल्हार के उत्खनन से यहां सातवाहन काल में नियोजित नगर-निर्माण के विकास का संकेत मिलता है।

इस काल से संबंधित:

  • ईंटों से निर्मित संरचनाएं
  • मृद्भांड
  • आवासीय संरचनाएं
  • नगर-योजना

का उल्लेख स्रोत में मिलता है।

CGPSC One-Liner

मल्हार में नियोजित नगर-निर्माण के विकास को सातवाहन काल से संबंधित बताया गया है।


शरभपुरीय काल और मल्हार

दक्षिण कोसल के इतिहास में शरभपुरीय और सोमवंशी राजवंशों का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

प्रदत्त सामग्री के अनुसार शरभपुरीय काल को लगभग 425 ईस्वी से 655 ईस्वी के बीच रखा गया है। इस काल को छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णकाल कहा गया है।

इस समय धार्मिक और ललित कला के कई प्रमुख केंद्र विकसित हुए।

पांच प्रमुख धार्मिक एवं कला केंद्र

  1. मल्हार
  2. ताला
  3. खरौद
  4. सिरपुर
  5. राजिम

इस सूची में मल्हार का शामिल होना इसकी कला और धार्मिक गतिविधियों के महत्व को दर्शाता है।


कलचुरी काल में मल्हार

मल्हार के इतिहास में कलचुरी काल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

प्रदत्त स्रोत के अनुसार कलचुरियों ने दक्षिण कोसल में अपना प्रभाव स्थापित किया। लगभग 1000 ईस्वी के आसपास कलिंगराज से संबंधित सत्ता-विस्तार के साथ दक्षिण कोसल में कलचुरी प्रभाव के पुनः स्थापित होने का उल्लेख मिलता है।

कलचुरी शासन के दौरान मल्हार का राजनीतिक और धार्मिक महत्व बना रहा।

स्रोत में पृथ्वीदेव द्वितीय के समय मल्हार के महत्वपूर्ण स्थान होने का उल्लेख है।

इसके बाद जाजल्लदेव द्वितीय के समय सोमराज द्वारा मल्हार में प्रसिद्ध केदारेश्वर मंदिर का निर्माण किए जाने का उल्लेख मिलता है।


पातालेश्वर मंदिर का इतिहास

मल्हार के प्रमुख स्थापत्य स्थलों में पातालेश्वर मंदिर विशेष महत्व रखता है।

प्रदत्त स्रोत के अनुसार जाजल्लदेव द्वितीय के समय सोमराज ने केदारेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था। यही मंदिर बाद में पातालेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

याद रखने की ट्रिक

केदारेश्वर → पातालेश्वर

अर्थात् मल्हार का केदारेश्वर मंदिर वर्तमान में पातालेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।


मल्हार की कला एवं स्थापत्य

मल्हार की पहचान केवल राजनीतिक इतिहास तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक विशेषताओं में कला, मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला का महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रदत्त सामग्री के अनुसार यहां:

  • शैव
  • वैष्णव
  • जैन

परंपराओं से संबंधित मंदिरों और मठों के विकास का उल्लेख मिलता है।

इससे मल्हार में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ स्थापत्य कला के विकास का संकेत मिलता है।


मल्हार की प्रमुख मूर्तिकला

मल्हार से प्राप्त मूर्तियां यहां की कला परंपरा को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं।

प्रदत्त स्रोत में पांचवीं से सातवीं शताब्दी ईस्वी के बीच निर्मित निम्न मूर्तियों का उल्लेख मिलता है:

  • शिव
  • कार्तिकेय
  • गणेश
  • स्कंदमाता
  • अर्धनारीश्वर

इन मूर्तियों से मल्हार और उसके आसपास के क्षेत्र में शैव परंपरा के प्रभाव का संकेत मिलता है।


मल्हार की विष्णु प्रतिमा

मल्हार से विष्णु की एक विशिष्ट प्रतिमा का उल्लेख मिलता है।

प्रदत्त सामग्री के अनुसार इस प्रतिमा पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में लेख पाया गया है और इसकी प्राचीनता लगभग 200 ईसा पूर्व बताई गई है।

यह मल्हार के प्राचीन धार्मिक और कलात्मक इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण तथ्य है।

Exam Fact

मल्हार → विष्णु प्रतिमा → ब्राह्मी लिपि


मल्हार में जातक कथाओं का शिल्पांकन

मल्हार की कला में केवल हिंदू धार्मिक विषय ही नहीं, बल्कि जातक कथाओं से संबंधित शिल्पांकन का भी उल्लेख मिलता है।

कच्छप जातक

स्रोत में कच्छप जातक से संबंधित एक दृश्य का उल्लेख है, जिसमें कछुए और हंसों से संबंधित कथा को शिल्प के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

उलूक जातक

दूसरी ओर, उलूक जातक में उल्लू को पक्षियों का राजा बनाने से संबंधित दृश्य का उल्लेख किया गया है।

याद रखने की ट्रिक

मल्हार की जातक कला = कच्छप + उलूक


सातवीं से दसवीं शताब्दी की मल्हार कला

प्रदत्त स्रोत के अनुसार सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच विकसित मल्हार की मूर्तिकला में उत्तर गुप्तकालीन विशेषताएं स्पष्ट दिखाई देती हैं।

इस काल में:

  • मूर्तिकला
  • बौद्ध स्मारक
  • बौद्ध प्रतिमाएं
  • धार्मिक कला

के विकास का उल्लेख किया गया है।

इससे पता चलता है कि मल्हार की कला परंपरा अलग-अलग धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों से विकसित हुई।


मराठा शासन और कलचुरी सत्ता का अंत

मल्हार के इतिहास को समझने के लिए छत्तीसगढ़ में कलचुरी सत्ता के अंत की घटना भी महत्वपूर्ण है।

प्रदत्त स्रोत में रघुनाथ सिंह को कलचुरी वंश का अंतिम शासक बताया गया है।

1742 ईस्वी में नागपुर के रघुजी भोसले ने अपने सेनापति भास्कर पंत के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में अभियान किया।

इस दौरान रतनपुर पर आक्रमण करके उसे जीत लिया गया।

इसके साथ छत्तीसगढ़ में कलचुरी सत्ता के अंत का उल्लेख स्रोत में मिलता है।


मल्हार के प्रमुख ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल

प्रदत्त फोटो गैलरी में मल्हार से संबंधित निम्न स्थलों का उल्लेख किया गया है:

  • दिदनेश्वरी देवी
  • मल्हार मंदिर
  • पातालेश्वर मंदिर
  • देउर मंदिर
  • चतुर्भुजी विष्णु मंदिर

इन स्थलों के कारण मल्हार आज भी छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।


CGPSC के लिए मल्हार के महत्वपूर्ण तथ्य

विषयमहत्वपूर्ण तथ्य
ऐतिहासिक स्थलमल्हार
क्षेत्रबिलासपुर क्षेत्र
प्राचीन मार्गकौशांबी से जगन्नाथपुरी की दिशा
सातवाहन कालनियोजित नगर-निर्माण
शरभपुरीय काललगभग 425–655 ई.
शरभपुरीय कालछत्तीसगढ़ का स्वर्णकाल
प्रमुख कला केंद्रमल्हार, ताला, खरौद, सिरपुर, राजिम
कलचुरी कालमल्हार का राजनीतिक एवं धार्मिक महत्व
मंदिरकेदारेश्वर
वर्तमान नामपातालेश्वर मंदिर
मंदिर निर्माणसोमराज, जाजल्लदेव द्वितीय के समय
प्रमुख मूर्तियांशिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता, अर्धनारीश्वर
विष्णु प्रतिमाब्राह्मी लेख का उल्लेख
जातक कलाकच्छप जातक, उलूक जातक
सातवीं–दसवीं शताब्दीउत्तर गुप्तकालीन विशेषताएं
1742 ई.रघुजी भोसले का अभियान

मल्हार को याद रखने की आसान ट्रिक

“मार्ग–नगर–स्वर्ण–मंदिर–मूर्ति–जातक”

मार्ग
→ कौशांबी से जगन्नाथपुरी की दिशा में प्राचीन मार्ग

नगर
→ सातवाहन काल में नियोजित नगर-विकास

स्वर्ण
→ शरभपुरीय काल = स्वर्णकाल

मंदिर
→ केदारेश्वर → पातालेश्वर

मूर्ति
→ शिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता, अर्धनारीश्वर

जातक
→ कच्छप + उलूक


मल्हार से संबंधित Frequently Asked Questions (FAQs)

मल्हार क्यों प्रसिद्ध है?

मल्हार अपने प्राचीन पुरातात्त्विक अवशेषों, नगर-विकास, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला और विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े प्रमाणों के कारण महत्वपूर्ण है।

मल्हार में नियोजित नगर-निर्माण किस काल में हुआ?

प्रदत्त स्रोत के अनुसार मल्हार में नियोजित नगर-निर्माण का विकास सातवाहन काल में हुआ।

शरभपुरीय काल की अवधि कितनी बताई गई है?

प्रदत्त स्रोत में शरभपुरीय काल को लगभग 425 से 655 ईस्वी के बीच रखा गया है।

मल्हार का पातालेश्वर मंदिर किससे संबंधित है?

पातालेश्वर मंदिर का संबंध केदारेश्वर मंदिर से बताया गया है।

मल्हार की प्रमुख मूर्तियों में कौन-कौन शामिल हैं?

शिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता और अर्धनारीश्वर आदि।

मल्हार में किन जातक कथाओं का शिल्पांकन मिलता है?

प्रदत्त स्रोत के अनुसार कच्छप जातक और उलूक जातक का उल्लेख मिलता है।

मल्हार की सातवीं से दसवीं शताब्दी की कला में किसकी विशेषताएं दिखाई देती हैं?

स्रोत के अनुसार इसमें उत्तर गुप्तकालीन विशेषताएं स्पष्ट दिखाई देती हैं।


CGPSC Exam Revision: 10 सबसे जरूरी बातें

  1. मल्हार — महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल।
  2. प्राचीन मार्ग — कौशांबी → मल्हार → सिरपुर → जगन्नाथपुरी
  3. सातवाहन काल — नियोजित नगर-निर्माण
  4. शरभपुरीय काल — 425–655 ई.
  5. शरभपुरीय काल — स्वर्णकाल
  6. पांच प्रमुख केंद्र — मल्हार, ताला, खरौद, सिरपुर, राजिम
  7. केदारेश्वर मंदिर — पातालेश्वर मंदिर
  8. प्रमुख मूर्तियां — शिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता, अर्धनारीश्वर
  9. जातक — कच्छप और उलूक
  10. सातवीं–दसवीं शताब्दी — उत्तर गुप्तकालीन कला विशेषताएं

निष्कर्ष

मल्हार छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरातत्व का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इसकी ऐतिहासिक यात्रा को प्राचीन मार्गीय महत्व, सातवाहन कालीन नगर-विकास, शरभपुरीय काल की कला गतिविधियों और कलचुरी कालीन स्थापत्य के माध्यम से समझा जा सकता है।

मल्हार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत है। यहां मंदिर स्थापत्य के साथ-साथ शिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता और अर्धनारीश्वर जैसी मूर्तियों तथा कच्छप और उलूक जातक से संबंधित शिल्पांकन का उल्लेख मिलता है।

CGPSC अभ्यर्थियों के लिए मल्हार को एक Integrated History Topic की तरह पढ़ना उपयोगी है—जहां पुरातत्व + राजवंश + नगर-विकास + धर्म + कला + स्थापत्य सभी एक साथ जुड़े हुए हैं।

मल्हार का इतिहास — CGPSC Quiz

20 महत्वपूर्ण MCQs | Hindi

नीचे दिए गए प्रश्न प्रदत्त मल्हार संबंधी स्रोत-सामग्री पर आधारित हैं। प्रश्नों में केवल स्रोत-समर्थित तथ्यों का उपयोग किया गया है।


प्रश्न 1. मल्हार किस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है?

A. दक्षिण कोसल
B. मालवा
C. बुंदेलखंड
D. विदर्भ

सही उत्तर: A. दक्षिण कोसल

व्याख्या: मल्हार को दक्षिण कोसल के इतिहास, कला और स्थापत्य से जुड़े महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

प्रश्न 2. प्राचीन मार्ग कौशांबी से दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट की ओर जाते समय निम्न में से किस स्थान से होकर गुजरता था?

A. मल्हार
B. उज्जैन
C. विदिशा
D. नालंदा

सही उत्तर: A. मल्हार

व्याख्या: प्राचीन मार्ग कौशांबी से भरहुत, बांधवगढ़, अमरकंटक, खुरुद, मल्हार, सिरपुर होते हुए जगन्नाथपुरी की ओर जाता था।

Leave a Comment