छत्तीसगढ़ का इतिहास और 36 गढ़ों का रहस्य: जानें स्थापना दिवस और राज्य के प्रतीक चिह्न (Chhattisgarh Sthapana Diwas History And State Symbols)

Chhattisgarh Sthapana Diwas 1 November history and state symbols like Hill Myna and Wild Buffalo

Chhattisgarh Sthapana Diwas History and State Symbols छत्तीसगढ़, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, घने जंगलों, खनिज संपदा और भोली-भाली जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है, भारतीय गणराज्य का 26वां राज्य है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्व भाग को अलग करके इस नए राज्य की स्थापना की गई थी। आज Moolpath Academy के इस विशेष ‘CGPSC पिलर नोट्स’ में हम छत्तीसगढ़ राज्य के नामकरण, इसके प्राचीन इतिहास, 36 गढ़ों के रहस्य और राज्य के उन आधिकारिक प्रतीक चिह्नों (State Symbols) का गहन विश्लेषण करेंगे, जिनसे हर साल CGPSC और Vyapam की परीक्षाओं में सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। चाहे आप आगामी CGPSC State Service Exam 2026 (सिलेबस और वेटेज) की तैयारी कर रहे हों या राज्य के एक जागरूक नागरिक हों, यह विस्तृत लेख आपके लिए छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत साबित होगा। 1. छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: रामायण और महाभारत काल छत्तीसगढ़ का भू-भाग अत्यंत प्राचीन है। प्राचीन काल में इसे ‘छत्तीसगढ़’ के नाम से नहीं जाना जाता था, बल्कि इसके अलग-अलग कालों में अलग-अलग नाम थे। रामायण काल में ‘दक्षिण कोसल’ रामायण काल में इस क्षेत्र को ‘दक्षिण कोसल’ (Dakshin Kosal) कहा जाता था। उत्तर कोसल की राजधानी अयोध्या थी, जबकि दक्षिण कोसल का विस्तार विंध्याचल पर्वत माला के दक्षिण में था। रामायण के अनुसार, राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या इसी दक्षिण कोसल की राजकुमारी थीं। वाल्मीकि कृत रामायण में स्पष्ट रूप से उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है। इस क्षेत्र के प्राचीन शासकों (जैसे कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम) के रतनपुर अभिलेखों में भी इस भू-भाग के लिए ‘दक्षिण कोसल’ नाम का प्रयोग हुआ है। महाकवि कालिदास रचित ‘रघुवंशम’ में भी कोसल और उत्तर कोसल का उल्लेख है, जिससे स्पष्ट होता है कि उस युग में वर्तमान छत्तीसगढ़ का क्षेत्र कोसल का ही भाग था। गुप्त काल और ‘महाकोसल’ का प्रयोग गुप्त काल में भी इसे कोसल ही कहा जाता था। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने अपनी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में इस क्षेत्र के लिए ‘महाकोसल’ शब्द का प्रयोग किया है। हालांकि, प्राचीन शिलालेखों या ताम्रपत्रों में ‘महाकोसल’ नाम का प्रयोग नहीं मिलता, बल्कि ‘कोसल’ या ‘दक्षिण कोसल’ ही मुख्य रूप से उपयोग किया गया है। रायबहादुर हीरालाल का मानना था कि चेदी वंशीय राजाओं का राज्य होने के कारण इसका प्राचीन नाम ‘चेदिसगढ़’ रहा होगा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर ‘छत्तीसगढ़’ बन गया, लेकिन इसके प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। 2. ‘छत्तीसगढ़’ नामकरण का ऐतिहासिक और साहित्यिक सफर यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि आखिर ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का पहली बार प्रयोग कब और किसने किया? CGPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों में यह टॉपिक अत्यधिक वेटेज रखता है। साहित्य में प्रथम प्रयोग (कवि दलराम राव – 1494) साहित्य के क्षेत्र में ‘छत्तीसगढ़’ नाम का सबसे पहला प्रयोग खैरागढ़ के राजा लक्ष्मीनिधि राय के चारण कवि दलराम राव ने सन् 1494 में किया था। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ थीं: “लक्ष्मीनिधि राय सुनो चित दे, गढ़ छत्तीस में न गढ़ैया रही।” जिस समय यह पंक्ति लिखी गई, वह भारत में सल्तनत काल था, जिससे यह प्रतीत होता है कि सल्तनत काल से ही इस भू-भाग के लिए ‘छत्तीसगढ़’ नाम प्रचलन में आने लगा था। गोपालचंद्र मिश्र की ‘खूब तमाशा’ (1686) इसके बाद, रतनपुर के कलचुरि राजा राजसिंह के दरबारी कवि गोपालचंद्र मिश्र ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘खूब तमाशा’ (सं. 1686) के छंद 7 में ‘छत्तीसगढ़’ नाम का उल्लेख किया था। बाबू रेवाराम की ‘विक्रम विलास’ (1896) मराठा काल के प्रसिद्ध साहित्यकार बाबू रेवाराम ने अपनी रचना ‘विक्रम विलास’ (सं. 1896) में भी इस शब्द का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है: “तिनमें दक्षिण कोसल देसा, जहां हरि औतु केसरी बेसा, तासु मध्य छत्तीसगढ़ पावन, पुण्यभूमि सुर मुनिमन भावन।” प्रथम पुरातात्विक/शिलालेखीय साक्ष्य (दंतेवाड़ा – 1702) अगर हम शिलालेखों की बात करें, तो ‘छत्तीसगढ़ी’ शब्द का सबसे पहला उल्लेख दंतेवाड़ा में मिलता है। इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र के अनुसार, 31 मार्च 1702 को बस्तर के तत्कालीन राजा के राजगुरु और मैथिल पंडित भगवान मिश्र ने एक शिलालेख लिखा था। यह शिलालेख आज भी दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में गर्भ गृह से पहले बने विशाल कक्ष की बाईं दीवार पर लगा हुआ है। 3. 36 गढ़ों का रहस्य और कलचुरि प्रशासन ‘छत्तीसगढ़’ का शाब्दिक अर्थ ‘छत्तीस (36) किले’ या ‘गढ़’ होता है। कलचुरि शासन काल में प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को गढ़ों में विभाजित किया गया था। जे. डी. बेगलर (J.D. Beglar) की किंवदंती अलेक्जेंडर कनिंघम के सहयोगी जे. डी. बेगलर ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया था। उनके अनुसार एक जनश्रुति (किंवदंती) है कि जरासंध के शासनकाल में 36 चर्मकारों (Leatherworkers) के परिवार इस क्षेत्र में आकर बस गए थे। इन्हीं परिवारों ने एक नया राज्य बसाया जिसे ‘छत्तीसघर’ कहा गया, और यही बाद में ‘छत्तीसगढ़’ कहलाया। हालांकि, इतिहासकार इस सिद्धांत को पूरी तरह सत्य नहीं मानते, बल्कि प्रशासनिक गढ़ों के विभाजन को ही इसका मुख्य कारण मानते हैं। शिवनाथ नदी द्वारा 18-18 गढ़ों का विभाजन कलचुरियों के शासनकाल में छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से दो शाखाओं में बंटा था—रतनपुर शाखा और रायपुर शाखा। इन दोनों शाखाओं के अधीन कुल 36 गढ़ (18-18 गढ़) थे। इन गढ़ों को शिवनाथ नदी भौगोलिक रूप से दो भागों में बांटती थी। शिवनाथ नदी के उत्तर में स्थित 18 गढ़ रतनपुर राज्य के अधीन थे, और शिवनाथ नदी के दक्षिण में स्थित 18 गढ़ रायपुर राज्य के अधिकार में थे। चिश्म (Chisholm) और हैविट (Hewitt) की रिपोर्ट में इन 36 गढ़ों की विस्तृत सूची दी गई है। रतनपुर के अंतर्गत आने वाले 18 गढ़ रतनपुर मारो विजयपुर खरौद कोटगढ़ नवागढ़ सोंढी औखर पंडरभाठा सेमरिया मदनपुर कोसगई लाफागढ़ केंदा उपरौड़ा मातिन कण्डरी (पेन्ड्रा) करकट्टी (अब बघेलखंड) रायपुर के अंतर्गत आने वाले 18 गढ़ रायपुर पाटन सिमगा सिंगारपुर लवन अमोरा दुर्ग सरदा (सारधा) सिरसा मोहदी खलारी सिरपुर फिंगेश्वर राजिम सिंघनगढ़ सुअरमार टेंगनागढ़ अकलतरा (एकलवार) 4. छत्तीसगढ़ के राजकीय प्रतीक (State Symbols of Chhattisgarh) 1 नवंबर 2000 को राज्य गठन के बाद, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, वन्यजीव और कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था को दर्शाने के लिए विशिष्ट राजकीय प्रतीकों को अपनाया गया। राजकीय प्रतीक चिह्न (State Emblem) छत्तीसगढ़ का आधिकारिक प्रतीक चिह्न राज्य की विकास की अदम्य आकांक्षा और सुरक्षा को दर्शाता है। … Read more

IIT Bombay Research: कोलेजन से बढ़ सकती है टाइप-2 डायबिटीज़ की गंभीरता | CGPSC Easy

IIT Bombay study finds Collagen may worsen Type 2 diabetes

जानिए IIT Bombay के नवीन शोध में कैसे कोलेजन I पैंक्रियाज में अमाइलिन क्लंपिंग को तेज करके टाइप-2 डायबिटीज़ को और गंभीर बना सकता है। पढ़ें CGPSC Easy पर हिंदी में पूरी जानकारी, नये उपचार के संकेत और UPSC/PSC के लिए उपयोगी तथ्य। IIT Bombay के शोध में डायबिटीज़ को लेकर नई जानकारी कोलेजन (Collagen) क्या है? कोलेजन हमारे शरीर में पाया जाने वाला एक प्रमुख प्रोटीन है। यह हमारे त्वचा (skin), हड्डियों (bones), टिश्यू (tissues), कण्डरा (tendons) और लिगामेंट्स (ligaments) में मौजूद होती है। हम इसको इस प्रकार समझ सकते है, शरीर का गोंद (glue); जो कोशिकाओं और ऊतकों को एक साथ जोड़ कर रखता है। टाइप-2 डायबिटीज़ दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रही है। अब IIT Bombay के वैज्ञानिकों ने इस बीमारी के पीछे छिपे एक नए कारक को खोजा है, जो इस बीमारी को और जटिल बना सकता है। शोध में पाया गया है कि हमारे शरीर में मौजूद कोलेजन I नामक प्रोटीन पैंक्रियाज में हॉर्मोन अमाइलिन के क्लंप्स (गांठें) बनाने की प्रक्रिया को तेज करता है। अमाइलिन वही हॉर्मोन है जो इंसुलिन के साथ मिलकर खाने के बाद ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है। जब शरीर में ब्लड शुगर बढ़ जाता है तो β-सेल्स अधिक अमाइलिन बनाते हैं। लेकिन अधिक मात्रा में अमाइलिन गलत तरह से मोड़कर ऐसे क्लंप्स बना देता है जो β-सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे इंसुलिन बनना कम हो जाता है और डायबिटीज़ की गंभीरता बढ़ जाती है। शोध में यह बात सामने आई कि पैंक्रियाज के टिश्यू में कोलेजन I की मात्रा डायबिटीज़ के दौरान बढ़ जाती है और यह अमाइलिन को एक प्लेटफॉर्म जैसा सपोर्ट देता है, जिससे वह जल्दी क्लंपिंग करता है। इसे देखने के लिए शोधकर्ताओं ने कई उन्नत तकनीकों जैसे Atomic Force Microscopy, Surface Plasmon Resonance, NMR spectroscopy आदि का इस्तेमाल किया। शोध का एक बड़ा निष्कर्ष यह भी रहा कि अब तक कई उपचार सिर्फ सेल के अंदर की प्रक्रियाओं पर केंद्रित रहते थे। लेकिन जब तक कोलेजन और अमाइलिन के इस खतरनाक संपर्क को रोका नहीं जाएगा, तब तक बीमार टिश्यू में toxic environment बना रहेगा और डायबिटीज़ बढ़ सकती है। शोधकर्ता अब इस interaction को समझने के लिए Cryo-EM मॉडल पर काम कर रहे हैं ताकि भविष्य में ऐसी दवाइयाँ बनाई जा सकें जो कोलेजन और अमाइलिन के जोड़ को रोक सकें। इसके अलावा पैंक्रियाज के β-सेल्स को फिर से मजबूत करने के लिए 3D बायो-स्ट्रक्चर आधारित थैरेपीज़ पर भी रिसर्च चल रही है। इस शोध ने टाइप-2 डायबिटीज़ की रोकथाम के लिए एक नया रास्ता दिखाया है कि केवल लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि शरीर के बाहरी मैट्रिक्स (Extracellular Matrix) में बदलाव भी बीमारी की प्रगति को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में इलाज की रणनीति में कोलेजन और अमाइलिन के इस घातक गठजोड़ को भी रोकना जरूरी होगा। Quick Quiz Q 1. IIT Bombay के शोध में किस कारक को type-2 डायबिटीज़ में amylin clumping को बढ़ाने वाला एक नया ट्रिगर पाया गया?A) इंसुलिनB) β-सेल्सC) कोलेजन I फाइब्रिलर प्रोटीनD) ग्लूकोज ट्रांसपोर्टर सही उत्तर: Cव्याख्या: स्टडी में पता चला कि extracellular matrix का प्रमुख घटक, फाइब्रिलर कोलेजन I, amylin aggregation को प्लेटफॉर्म देकर β-सेल्स को और अधिक toxic करता है। Q 2. Amylin aggregation β-सेल्स को किस प्रकार प्रभावित करता है?1 सेल death pathways सक्रिय करता है।2 β-सेल्स की insulin उत्पादन क्षमता घटाता है।3 Oxidative stress बढ़ाता हैकूट चुनिए:A) केवल 1 और 2B) केवल 2 और 3C) केवल 1 और 3D) 1, 2 और 3 सभी सही उत्तर: Dव्याख्या: कोलेजन और अमाइलिन साथ में β-सेल्स में oxidative stress बढ़ाते हैं, insulin उत्पादन घटाते हैं और apoptosis pathways को सक्रिय करते हैं। Q 3. Type-2 डायबिटीज़ में amylin किस परिस्थिति में misfold होकर toxic clumps बनाता है?A) जब insulin कम बनता हैB) जब amylin कम बनता हैC) जब amylin का high concentration होता हैD) जब β-सेल्स divide नहीं होते सही उत्तर: Cव्याख्या: जब शरीर अधिक insulin release करने की कोशिश करता है, तब amylin का स्तर भी बढ़ता है और high concentration में amylin misfold होकर clumps बना लेता है। Q 4. शोध में प्रयोगशाला में β-सेल्स पर किए गए परीक्षणों में पाया गया कि amylin और कोलेजन मिलकर क्या प्रभाव डालते हैं?A) सेल्स अधिक insulin बनाते हैंB) सेल्स stress-free रहते हैंC) सेल्स में मृत्यु दर बढ़ जाती हैD) सेल्स regenerative होते हैं सही उत्तर: Cव्याख्या: कोलेजन और amylin साथ में β-सेल्स पर toxic प्रभाव डालते हैं, जिससे oxidative stress और apoptosis pathways सक्रिय होकर cell death बढ़ती है। Q 5. IIT Bombay की टीम ने amylin और कोलेजन I के इंटरैक्शन को जानने के लिए कौन सी techniques प्रयोग की?A) केवल Cryo-EMB) केवल Atomic Force MicroscopyC) Surface Plasmon Resonance, AFM, Thioflavin T fluorescence और NMR spectroscopyD) X-ray diffraction only सही उत्तर: Cव्याख्या: टीम ने binding strength देखने के लिए SPR, adhesion के लिए AFM, aggregation kinetics के लिए Thioflavin T fluorescence और protein interaction sites जानने के लिए NMR spectroscopy का प्रयोग किया। Q 6. Type-2 डायबिटीज़ में extracellular matrix का कौन सा पहलू β-सेल्स के toxic microenvironment को बढ़ा सकता है?A) माइटोकॉन्ड्रियाB) CytoplasmC) कोलेजन I matrixD) Ribosome activity सही उत्तर: Cव्याख्या: कोलेजन extracellular matrix का हिस्सा है जो amylin aggregation को accelerate कर toxic environment बनाता है। Q 7. अध्ययन के अनुसार diabetes progression रोकने के लिए भविष्य में किस दिशा में दवाइयाँ विकसित की जा सकती हैं?A) केवल insulin synthesis बढ़ानाB) amylin और कोलेजन interaction को disrupt करनाC) β-सेल्स proliferation रोकनाD) केवल glucose intake कम करना सही उत्तर: Bव्याख्या: शोधकर्ता के अनुसार जब तक amylin और collagen के interaction को disrupt नहीं किया जाएगा, toxic microenvironment पूरी तरह समाप्त नहीं होगा।

दुड़मा वाटरफॉल (Dudma Waterfall): छत्तीसगढ़ का उभरता पर्यटन केंद्र

दूधमा जलप्रपात (Dudma Waterfall)

दुड़मा वाटरफॉल (Dudma Waterfall) Dudma Waterfall: छत्तीसगढ़, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध, अनेक अनछुए पर्यटन स्थलों का घर है। इनमें से एक है दूधमा जलप्रपात, जो हाल ही में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। यह जलप्रपात न केवल अपनी मनमोहक दृश्यावली के लिए जाना जाता है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। मकरभंजा जलप्रपात – Makarbhanja Waterfall Chhattisgarh दुड़मा जलप्रपात की भौगोलिक स्थिति दुड़मा जलप्रपात छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में स्थित है। यह क्षेत्र अपने घने जंगलों, विविध वन्यजीवों और जनजातीय संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर दुड़मा वाटरफॉल जिला मुख्यालय सुकमा से लगभग 28 किलोमीटर दूर छिंदगढ़ विकासखंड के ग्राम पंचायत चिपुरपाल में स्थित है। रास्ते में हरे-भरे जंगल और प्राकृतिक दृश्य यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य और आकर्षण दुड़मा जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 100 फीट है, जिससे गिरता हुआ पानी दूधिया सफेदी लिए होता है, जो इसे ‘दुड़मा’ नाम प्रदान करता है। बरसात के मौसम में जलप्रपात अपने पूर्ण यौवन पर होता है, जब पानी की मात्रा और प्रवाह अधिक होता है। इसके आसपास का क्षेत्र हरे-भरे जंगलों से घिरा है, जहां विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए स्वर्ग समान है। सांस्कृतिक महत्व दुड़मा जलप्रपात के निकट कई जनजातीय समुदाय निवास करते हैं, जो अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और लोक कला के लिए जाने जाते हैं। यहां के स्थानीय मेले और त्योहार पर्यटकों को आदिवासी संस्कृति की झलक प्रदान करते हैं। इसके अलावा, जलप्रपात के पास स्थित प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल आध्यात्मिक पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं। पर्यटन विकास और सुविधाएं हाल के वर्षों में, छत्तीसगढ़ सरकार और स्थानीय प्रशासन ने दुड़मा जलप्रपात को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कई पहल की हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का सुधार, रेस्ट हाउस और भोजनालयों की स्थापना, और सुरक्षा उपायों का प्रबंध किया गया है। इसके अलावा, स्थानीय गाइड और सूचना केंद्रों की व्यवस्था भी की गई है, ताकि पर्यटकों को क्षेत्र की जानकारी और सहायता मिल सके। पर्यटकों के लिए सुझाव निष्कर्ष दुड़मा जलप्रपात छत्तीसगढ़ के उन अनमोल रत्नों में से एक है, जो प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक धरोहर और रोमांच का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। यदि आप प्रकृति की गोद में सुकून के पल बिताना चाहते हैं और स्थानीय संस्कृति का अनुभव करना चाहते हैं, तो दुड़मा जलप्रपात की यात्रा अवश्य करें।